Tuesday, January 23, 2024
विडम्बना
इसे आज की विडंबना ही कहूँगा कि जो कुछ भी हम सुनते आ रहे हैं वो बस मन का एक छलावा मात्र ही निकल कर सामने आया है।अक़्सर जब भी हम अपने बच्चों का रिश्ता करने की बात करते हैं तो दो ही बातें अहम होतीं हैं,कि लड़की औऱ उसके पिता को लड़के की कमाई औऱ बाप की सम्पति की पूरी जानकारी दी जानी चाहिए,परन्तु लड़की के बारे में सिर्फ़ इतना बताना ही काफ़ी है कि वो संस्कारो से भरी है।दहेज़ के वारे में तो ज़िक्र भी नहीँ करना है,वो महापाप में आता है।तो जब दहेज़ कुप्रथा है तो बाप-बेटे की सम्पत्ति का हिसाब-क़िताब कौन सी प्रथा में आता है?क्या लड़के वाला अपनी बहू को रोटी भी नहीँ खिला पाने में सक्षम होता है या बेटा घर मे औऱ बहु को सड़क पर सुलायेगा।तो फ़िर इन सब सवालों को पूछ कर बेटे को उसके पिता को क्यों अपमानित किया जाता है?औऱ दूसरी तरफ़ वही सस्कारों से लदी लड़की एक-दो महीनों के भीतर ही अपनी सुसराल में अपने सस्कारों का ऐसा तांडव मचाती है कि पिता का घर सिर्फ़ पिता का ही घर बन कर रह जाता है,बेटा माता-पिता का न होकर सास-ससुर का बन जाता है।बेटे की ज़िन्दगी पर उसकी कमाई पर सिर्फ़ पत्नी औऱ ससुराल वालों का आधिपत्य हो जाता है।कहाँ से आतीं हैं ये सस्कार वालीं बेटियाँ, कौन सी शिक्षा देते हैं इनके माँ-बाप इनको, क्या बेटे का पिता होना भी अब एक जुर्म है?कहाँ जाएं बेटे के माता-पिता?कौन सा कानून उनको न्याय देने के लिए है?बेटी चाहे तो झूठे दहेज़ के केस में सभी बालिग़ औऱ नाबालिग़ को जेल करा दे,परिवार तो हर हाल में लुटता-पिटता ही है।क्या करें?सस्कार औऱ कानून की जय हो।
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