Tuesday, May 28, 2024
योग्यता औऱ सभ्यता
योग्यता औऱ सभ्यता दोनों अलग-अलग हैं।लोगों को अक़्सर भृम रहता है कि जो योग्य है वो सभ्य भी होगा,तो ऐसा नहीँ है।योग्यता किताबों का जवाब है तो सभ्यता सस्कारों का परिणाम है।जब बच्चा पढ़ने-लिख़ने में अच्छा होता है तो वो डिग्रियों का पर्वत बना देता है परंतु जब वो आप से बात करता है,व्यवहार करता है तो किताबी ज्ञान से ज्यादा सस्कारों की ज़रूरत पड़ती है,जो स्कूल से नहीँ परिवार औऱ माँ से मिलते हैं, मग़र कुछ बच्चे यहाँ भी विफ़ल हो जाते हैं।जब वो अन्य परिवार की लड़की के सम्पर्क में आते हैं, विवाह बंधन में बंध जाते हैं तो पत्नी के सस्कारों के प्रभाव में आते ही उनके अपने सस्कार डिलीट हो जाते हैं, जैसे कोई बिलेकबोर्ड पर डस्टर फ़ेर देता है।आज-कल ऐसे परिणाम ज्यादा देखने को मिल रहे हैं।उन्हें बताया जाता है कि तुम्हारे माँ-बाप ने तो तुम्हारा जीवन ही बिगाड़ दिया,उन्होंने तुम्हारे लिए कुछ किया ही नहीँ।औऱ ये बिचारे पत्नी भक्त जिन्हें इतना प्यार क़भी मिला ही नहीँ पत्नी के चरणों मे नतमस्तक हो जाते हैं, रही-सही कसर पत्नी के परिवार वाले अपनी शिक्षा से पूरा कर देते हैं,लड़के को भी लगने लगता है कि अब मुझे सच्चा प्यार औऱ असली माता-पिता के दर्शन हुये हैं,न जानें अब-तक कैसे जीवन जी रहा था।यहाँ पर योग्यता औऱ सस्कारों की लड़ाई शुरू होती है और आखिरकार पत्नी के सस्कारों की विजय होती है।तो इसी लिये कहता हूँ कि हर डिग्री वाला व्यक्ति समझदार हो ज़रूरी नहीँ है।इसका मतलब ये भी नहीँ होता कि अपने अच्छे सस्कार अपने बच्चे को नहीँ दिये हैं।हर माँ-बाप अपने बच्चे को अच्छे से अच्छे सस्कारों से सजाते हैं मग़र कुछ बच्चे होते हैं जो धूप में चमकते शीशे को हीरा समझ बैठते हैं औऱ राह भटक जाते हैं, परन्तु क़भी-क़भी समझने में इतनी देर हो जाती है कि वापसी के रास्ते भी बंद हो जाते हैं।हालाँकि सभी बच्चे ऐसे नहीँ होते हैं।उनके ख़ून में सस्कार औऱ माँ-बाप ऐसे घुल-मिल जाते हैं कि क़िसी के छल-कपट में वो नहीँ आते हैं औऱ जीवन भर अपने माता-पिता को भगवान समझते हुये उनकी सेवा में अपना जीवन अर्पित का देते हैं, ऐसे बच्चे समाज मे अपना स्थान हमेशा शिखर पर पाते हैं,ईश्वर सदैव उनके साथ वास करते हैं।
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