Friday, February 14, 2025

निमंत्रण

धन्यवाद,निमंत्रण आप का स्वीकार है,परन्तु मेरा स्वभाव मुझे शांति की ओर धकेलता है,शोर भरी रातों से मैं हमेशा बचता रहा हूँ,धन्यवाद, तुम्हारे आदर-सम्मान के लिये,प्रभु खुशियाँ तुम्हें हज़ार दें,मैं नाराज़ नहीँ,मुझमें अहंकार भी नहीँ,परन्तु मैं महफ़िलों में क़भी नज़र आता ही नहीँ हूँ,मुझे मेरी ही हदों में रहने दो,मुझे मेरे सपनों को सजाने दो,मैं तुम्हारी दुनियाँ में दख़ल कहाँ देता हूँ,तुम भी दख़ल मेरी दुनियाँ में न दो,मैं जी नहीँ सकता तुम्हारी ज़िन्दगी को,तुम मुझे मेरी जिंदगी को जीने दो,है कोई ऐसा जो पथ से अपने भटक जाये,मुझको भी मेरे पथ पर ही चलने दो,मैं विरोधी नहीँ हूँ तुम्हारे विचारों का,मेरे विचारों को भी तुम तन्हा ही रहने दो,मैं क्या मेरी तन्हाई भी अब शोर से डरती है,तन्हा हूँ हाँ तो तन्हा मुझे तुम रहने दो,ज़िद न किया करो परम्पराऐं टूटती हैं ऐसे,बस तुम अपनी औऱ मुझे अपनी हद में रहने दो,क्यों गुज़रता नहीँ ये दिन देख़ो तो कितना लम्बा दिन हो गया है,अब सोना है मुझे रात को ज़रा तुम होने दो,मैं इश्क बहुत करता हूँ अपनी इस छवि से,हाथ पानी मे न डालो छवि मेरी यूँ ही रहने दो,मैं उजाला नहीँ हूँ सूरज का,रातों का साथी मुझे बने रहने दो,है बस एक औऱ आख़री इरतज़ा मेरी तुमसे,मुझे मेरी ही नज़रों में यूँ बार-बार गिरने न दो,मैं हूँ ज़िन्दा मेरे स्वभाव से ही,मेरे स्वभाव के साथ ही मुझे ज़िन्दा रहने दो।                                                            अरिनास शर्मा,बिलारी।