Thursday, August 14, 2025
काल्पनिक कथा।
जय औऱ विजय दो सगे भाई आमने-सामने ही तो रहते थे।बस घरों की दूरी इतनी थी कि बीस फिट की सड़क बीच में थी।दोनों भाइयों में बचपन में बड़ा प्रेम था,मग़र क़िसी बात पर एक दिन दोनों में मतभेद हो गये।आना-जाना बंद हो गया।एक घर के बाहर निकलता तो दूसरा घर के अंदर होता,क़भी-क़भी एक दूसरे की आवाज़ सड़क से घर के अंदर आ जाया करती थी।दिन बीतते गये त्यौहार निकलते गये,दोनोँ परिवारों के बच्चों का भी आना-जाना बंद हो गया।एक दिन बैठे-बैठे जब मैं ऊब गया औऱ मन की तन्हाई ने भी ऊब कर मुहँ फेर लिया तो याद आया कि सामने के घर में तो मेरा छोटा भाई भी रहता है,कई दिनों से उससे मिला भी नहीँ हूँ चलो आज मिलकर आता हूँ। औऱ ये सोच कर मैं जब अपने घर से बाहर आया तो पहले से ही एक बुज़ुर्ग दरवाज़े के सामने खड़ा मेरे घर को ही निहार रहा था,मेरे बाहर पहुँचते ही मेरा नाम लेकर मेरे ही बारे में पूछने लगा।मैंने बताया कि जय तो मैं ही हूँ मग़र अभी बिज़ी हूँ,उसने पूछा क्या हुआ तो मैंने बताया कि मैं सामने वाले घर में अपने भाई से मिलने जा रहा हूँ।वो बोला वो घर तो मेरा है,ऐसे कैसे हो सकता है वो घर तो मेरे छोटे भाई विजय का है,लेक़िन विजय तो मैं ही हूँ।हम दोनोँ ने एक दूसरे को गौर से देख़ा लगा चेहरा तो कुछ-कुछ पहचाना सा लगता है,मग़र ये कैसे हो सकता है मेरा छोटा भाई तो बीस साल की आयू का है औऱ इस की उम्र सत्तर-पिछत्तर की लग रही है। उसने लम्बी साँस खींची औऱ मेरे कँधे पर अपना हाथ रख कर बोला जय भैया मैं ही तुम्हारा छोटा भाई विजय हूँ।हम दोनोँ की आँखे नम हो चलीं थीं, बस ये पता नहीँ कि ये आँसू ग़म के थे या ख़ुशी के थे।इतने वर्ष हो गये हमको मिले-बात कर हुये कि हम-दोनोँ ही इतने बूड़े हो चुके थे कि एक-दूसरे को पहचान भी नहीँ पा रहे थे।शायद बहुत देर कर दी ये फ़ैसला लेने में कि पहले कौन आकर मिलेगा।हम -दोनोँ एक-दूसरे से गले लग कर पछतावे के आँसुओ से अपनी हठ को धोने में लगे थे तभी एक अधेड़ व्यक्ति एक बच्चे को गोद में लिये विजय के घर से निकला औऱ विजय के पास आकर खड़ा हो गया।विजय ने उससे कहा बेटा अमर इनके पैर छू कर आषीर्वाद ले लो ये तुम्हारे ताऊजी हैं।मैंने पूछा ये कौन है?अरे ये मेरा बेटा है जो तेरे ही घर में पड़ा रहता था औऱ इसकी गोद में इसका बेटा है यानी हमारा पोता है।मैंने दोनोँ के सर पर हाथ रख दिया। हम दोनोँ का गला भर आया था बोलने को शब्द नहीँ थे।मैं ये सोच कर घर के अंदर आया कि आज आईना गौर से देखूँगा कि मैं कैसा लगता हूँ,मैं ज़िन्दा हूँ या मर गया हूँ।। लेखक ------------- अरिनास शर्मा """"""""""""""""""""""""""
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