Thursday, September 18, 2025
एक विचार।
अक़्सर लोग जन्मदिन बड़े धूमधाम से मनाते हैं केक काटते हैं मोमबत्तियां बुझाते हैं दावतें उड़ाते हैं मग़र मेरी समझ में यह नहीँ आता है कि ये सब हमें करना भी चाहिये या नहीँ क्योंकि ऐसा तो है नहीँ कि भविष्य का हमें बोध नहीँ है,हम जन्मदिन की ख़ुशी मना रहे हैं या उम्र का एक वर्ष और कम हो जाने को नजरअंदाज करना चाह रहे हैं एक तरफ़ उम्र बड़ी तो दूसरी तरफ़ उम्र घटी भी तो परन्तु अक़्सर हम सच्चाइयों से मुहँ छुपाते हैं जो जीवन में कटु सत्य हैं, हमारी शिक्षा हमारे सँस्कार हमारी सभ्यता अब समाज में नज़र क्यों नहीँ आती है क्या हमने अपने-अपने दायित्यों से मुहँ मोड़ लिया है या आने वाली पीड़ी ने पारिवारिक शिक्षा को पूर्ण रूप से नकार दिया है या हम ही सही मार्गदर्शन करने में पूरी तरह असफ़ल हो चुके हैं,परिवार बिखरते जा रहे हैं रिश्ते टूटते जा रहे हैं बेटे घर से दूर जा रहे हैं बेटियाँ परिवार को त्यागने में सर्वप्रथम हैं बेटा माँ-बाप की सेवा करने में विफल है तो सँस्कारी बेटी विवाह उपराँत घर तोड़ने में लगीं हैं आख़िर हम अपने समाज को किधर ले के जा रहे हैं हमारी सभ्यता हमारी संस्कृति पश्चिमी संस्कृति के आगे कमज़ोर पड़ गई है,अब एक परिवार के अनेक परिवार नज़र आ रहे हैं सभी अलग-अलग घरों में बंद दरवाज़े के पीछे ख़ुद को प्रसन्न समझ रहे हैं वो परिवार की एकता-अखंडता को पीछे छोड़ आज अकेले-अकेले जीवन बिताने को ज्यादा अच्छा और महत्वपूर्ण समझ रहे हैं वो समझ ही नहीँ पा रहे हैं कि परिवार और प्रेम में कितनी शक्ति कितनी मधुरता है जिसे देखो वो ज्ञान का भंडार लिये घूम रहा है न सुनना चाहता है न समझना चाहता है न ही उन्हें समझाने वाले सही दिशा दिखा रहे हैं हर आदमी व्यक्तिगत लाभ कमाने के चक्कर में आने वाली पीड़ी को भटकाने का काम कर रहा है कम से कम एक समय तो ऐसा निकालो कि ख़ुद को आईने के सामने खड़े कर के ख़ुद से सवाल करो कि जो तुम्हारे फ़ैसले हैं वो सही हैं या कहीँ तुम कुछ भूल तो नहीँ कर रहे हो जिसका पछतावा तब हो जब तुम अपना सब-कुछ खो चुके हो,स्वर्ग-नरक जीवन-म्रत्यु अच्छा-बुरा धर्म-अधर्म सब बातों का ज्ञान सभी को है परंतु फ़िर भी भटका हुआ ग़लत रास्ते पर चला जा रहा है और समझने-सुनने को भी तैयार नहीँ है ये आज के युग के लोग विज्ञान को मानने वाले साँस भी लेते हैं क़भी मंदिर भी जाते हैं रात ओर दिन भी नज़र आते हैं मग़र इस सब के वजूद पर सवाल ज़रूर उठाते हैं इन्हें इन्हीं की हुई हर बात किया हुआ हर काम ही ठीक लगता है ये अपने मन में अपनी एक अलग ही दुनियाँ बना के चल रहे हैं इन्हें भटकना मंजूर है हाथ पकड़ना मंजूर नहीँ है झूठे अहंकार काल्पनिक दुनियाँ चंद पलों की खुशी और पूर्ण आज़ादी ही इनके जीवन जीने का उद्देश्य और आधार हैं न तो रिश्तों का महत्व है न परिवार का महत्व है न प्रेम की आवश्यकता है बस ऐसे लोग अपने आप में ही ख़ुश रहते हैं या इन्हें ख़ुश रहने का अभिनय करने के लिये मज़बूर किया जा रहा है परंतु दोनोँ ही कारणों में इनकी हार है जो समझाने आगे क़दम बड़ाता है उसकी सोच को नीचा बताकर अपमानित कर के चुप करा दिया जाता है ये है आज की पीड़ी,जब जाग जाओ तभी सवेरा है प्रभु करे इस पीड़ी के जीवन का सूरज भी जल्दी उदय हो इनके जीवन में भी सुख-संवर्द्धित-हर्ष आये इन्हें सही दिशा का ज्ञान हो अपनी सभ्यता-संस्कृति को अपनाते हुए आगे चलें आने वाली पीड़ी को भी सही दिशा दे पाएं इनका कल्याण हो। अरिनास शर्मा।
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