Saturday, November 8, 2025
इंसाफ़
इंसाफ़ है ये कैसा मेरे लिये कि ख़ुशी मिले तो छड़-भर मिले औऱ दर्द मिले तो ऐसा औऱ इतना कि दर्द से भी दर्द करहा उठे हँसी भी आई होठों पर बस पल-भर के लिये ही औऱ गिरे तो आँख भर-भर गिरे न जानें समय ने कैसा है ये खेल खेला कि हाथ ख़ाली औऱ दूर कहीँ आसमाँ ज़मी से जा मिले ये खेल तो नहीँ दो खिलाड़ी का नज़र में जीते तू ही औऱ हार बस मुझे ही क्यूँ मिले मेरी ज़िंदगी कोई पल की तो नहीँ तो ज़मी मुझे बस ज़रा सी ही मिले ये कोई फ़ैसला सुकूं से भरा भी नहीँ साँस भी लिये तो गिन-गिन कर लिये है चंद दिनों का ही तो खेला फ़िर तो मैंदान में भी खिलाड़ी ज़मी पर ही गिरे क्यों आनन्द इतना तुझको आता है मुझ पर कि मेरी आँख तुझको नम ही अच्छी लगे हैं बहुत शिकायतें मेरी ज़िंदगी को तुझसे तू कहाँ है बस तेरी एक झलक तो मिले मुझे रोना बहुत है तेरी गोद मे सर रख कर तेरा हाथ मेरे सर पर तो लगे मैं उलझा रहा यूँ ही व्यर्थ की ही उलझनों में एक रस्ता ज़मी पर मुझे भी तो मिले मैं भटका नहीँ उलझ गया हूँ ख़ुद-ही में मुझे भी तो मेरी ज़िंदगी की ख़बर तो मिले मैं ज़िन्दा हूं या नहीँ भी हूँ अब फ़र्क किसे पड़ता है जब खुले आसमाँ की हवा ही न मिले-मिले तो बस दर्द के पुलनदे ढो-ढो कर मेरे अब कंधे भी थके मुझे मेरी मंज़िल का किनारा भी नज़र आता नहीँ है नज़र आ जाये तो बैठ जाऊँ अब तो शरीर भी ज़बाब दे चले कि इससे पहले बिखर जाऊँ टूट जाऊँ रेत के घर की तरह बस एक बार तू आँख में मेरी ख़ुशी की रौशनी भर दे। अरिनास शर्मा। ---------------------- -----------------------
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