Saturday, January 3, 2026

जंग

                                   जंग                                                      सरहद से कब जंग शुरू होती है,सरहदें होती हीं कहाँ हैं,जंग तो घर में घर की चार दीवारों से शुरू होती है,आपसी मत भेद जंग का पहला बीज बोते हैं,जिसे पनपने से घर के बड़े भी नहीँ रोक पाते हैं,कारण कोई भी हो सरहदें खिंचनी शुरू हो ही जातीं हैं,घर बटते हैं ज़मीनें बंटती हैं यही प्रकिरिया इतना भयानक रूप ले लेती है कि एक दिन देश बट जाता है,जंग तब असली शुरू होती है,सरहदें जंग रोकने का काम नहीँ करतीं हैं,सत्ता में बैठे बड़े सत्ता धारी अपनी-अपनी ज़मीन को बचाने के लिये जंग को बड़ा रूप देनें में माहिर हो जाते हैं,पहले घर के टुकड़े फ़िर देश के टुकड़े फ़िर जाती-वाद के बहाने नागरिकों के टुकड़े फ़िर बोट के लिये अलग-अलग मंच तैयार हो जाते हैं,कौन-कब जंग लड़ना चाहता था कौन कब जंग लड़ना चाहता है,सभी को अलग ज़मी चाहिये सभी शांति का दूत बने घूमते भी हैं,हम शांति प्रिये लोग हैं हमें जंग से क्या लेना-देना,न जाने फ़िर भी किस वज़ह से किसकी वज़ह से सरहदें बन गईं,न जानें अब कौन-कब-कैसे फ़िर से एक घर एक छत ऐसी बनाएगा जिसके नीचे सभी फ़िर से एक साथ रहेंगे,कहते हैं दुश्मन कोई क़िसी का नहीँ होता है,सभी अपनी-अपनी ज़मी के लिये शहीद होते हैं,ये ज़मी तो एक टुकड़ा ही थी न,फिर इतने टुकड़े किसने किये औऱ किसने करने दिये,उस माँ का क्या क़सूर जिसका बेटा ज़मी के नाम पर शहीद हो गया,उस पत्नी का क्या क़सूर जिसका पति एक ज़मी के नाम पर शहीद हो गया,न जानें कितने रिश्ते शहीद हुए न जानें कितने घरों के चिराग़ बुझ गये,क्या क़िसी के पास अपने-अपने शहीदों की शहादत का हिसाब है,क्या कोई इस बात पर मोहर लगा सकता है कि भविष्य में जमी के नाम पर अब कोई जंग नहीँ होगी,अब क़िसी का बेटा पति पिता चिता पर जमी के नाम पर नहीँ सोएगा,जंग होती तो भूख के किये होती जंग होती तो शिक्षा के लिए होती जंग होती तो रोज़गार के लिए होती जंग होती तो तरक्की के लिए होती,जंग करने के लिए कई बहाने कई कारण हो सकते थे,मग़र हम अकेले हर फ़ैसला करने को कहाँ आज़ाद होते हैं,मग़र हम कब कहाँ क़िसी को अपना बनाने के लिए सीने से लगाते हैं,हमारी तो ख़ुद की आस्तीनों में इतने साँप पल रहे हैं कि न जानें वो कब हम ही को न डस लें,पहले ख़ुद की सफ़ाई करनी होगी पहले आस्तीनों के सापों को एक-एक कर कुचलना होगा,जब-तक हम सुरक्षित महसूस नहीँ करेंगे तब-तक अन्य को कैसे सुरक्षा का आशवासन दे सकते हैं, तो इस बात से तो निश्चिन्त रहिये की जंग जीते-जी तो ख़त्म नहीँ होगी,सरहदें बड़ती रहेंगी जंगे होती रहेंगी,देश बनते-टूटते रहेंगे,शांति का लॉलीपॉप मिलता रहेगा,धैर्य रखिये।।                                                                           अरिनास शर्मा                                                                      ----------------------