Tuesday, April 5, 2022
आत्मा
आत्मा,हवा,ईश्वर अर्थात जीवन।जीवन को जीने के लिये आत्मा का शुध्दिकरण अति आवश्यक है,इसके लिये शुद्ध हवा,शुद्ध वातावरण औऱ परम् आनन्द के साथ ईश्वर भक्ति का होना अति आवश्यक है।हम बड़े-बड़े पंडालों में कथावाचकों द्वारा मन को शुद्ध करने के लिये उनके वचन सुनते हैं औऱ हमें लगता है कि इससे अच्छा इससे सुँदर कुछ औऱ हो ही नहीँ सकता है औऱ यह सही भी है परन्तु पंडाल से घर आने के बाद भी वो वचन हमें याद रहते हैं, उन वचनों का हम अपने जीवन में पालन भी करते हैं या सिर्फ़ वो सब पंडाल तक ही सीमित रहता है।हम कितने ही वचन क्यों न सुन लें,हम कितने ही तीर्थ स्थानों पर बार-बार जाकर प्रभु का गुड़गान करलें परन्तु जब-तक हम स्वम् के विचारों का शुध्दिकरण नहीँ करते तब-तक सब व्यर्थ है।हमारे जीवन में हमारे विचार से,हमारे कर्म से,हमारे स्वभाव से अग़र कोई अपना या गैर पीड़ित है तब-तक हमारे जीवन का कोई अर्थ नहीँ है।हम अपने कर्म को कथनी से अलग रखेंगे या अपने कथन द्वारा अपने कर्म में भेद करेंगे तो हमारा जीवन व्यर्थ है,छल है।ईश्वर आपकी पूजा को तब-तक ग्रहण नहीँ करते जब -तक आप सम्मान,प्रेम औऱ क़िसी के प्रति समर्पण भाव को नहीँ समझते।किसी एक का आदर-सत्कार करके अनेकों का अपमान करना क्या उचित हो सकता है।इस-पर विचार करने की आवश्यकता है।अपने धर्म का पालन प्रभु की भक्ति से पहले अति आवश्यक है।यूँ ही ईश्वर की कृपा नहीँ बरसती है।विचार करें।
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