Friday, December 26, 2025

वक़्त

आज-कल दर्द में डूबा हुआ फ़िरता हूँ,टूटे हुये दिल को संभाले फ़िरता हूँ,बारिशें चाहें हों जितनी भी,आँसुओं से आँखें धो लेता हूँ,गहरा है अंधेरा रात का,तारों से मन बहला लेता हूँ,दूर होते मेरे अपने मुझ ही से,गैरों को अपना बना लेता हूँ,चंद रोज़ से ही हुए हैं हाथ ख़ाली मेरे,अब तो साये को भी अपने पीछे छोड़ चला हूँ,राहें मेरी मंजिल मेरी पर्वत सी मग़र अड़चन मेरी,जोश बहुत है मग़र ज़िस्म से हार बैठा हूँ,दुनियाँ बड़ी समन्दर जितनी,उम्मीद ज़रा सी मग़र लिये बैठा हूँ,डोलता-फ़िरता जैसे आवारा लहरों पर नाव कोई,कौन पहुँचाये किनारे पर,एक माँझी ढूंढता फ़िरता हूँ,क्या होगी आरज़ू अब जीवन की,बस साँसें अपनी संभाले फ़िरता हूँ,मुहँ मोड़ लेते हैं अपने भी,मैं हँसता था इन बातों पर अक़्सर,ज़िन्दगी समझा रही है,क़िताब के हर पन्ने का सबक,आँखों मे देखकर भी कैसे आँखे चुरा लेते हैं अपने,ज़हर पीकर दवा खोज रहा हूँ,बेमुरव्वत है दुनियाँ आँसू का मोल कुछ नही है,रो-रो कर आँखों को समझा रहा हूँ,कोई नहीँ गर्दीष का गवाह सिवाय मेरी तन्हाई के,ख़ामोशी से बैठ कर ख़ामोशी से ही बात किये जा रहा हूँ,बस सफ़र है बाक़ी जो वो भी गुज़र जायेगा,बस गुंगनाये जा रहा हूँ मुस्कुराए जा रहा हूँ,हाँ-तकलीफ़ तो दे रही है ज़िन्दगी बहुत मुझे,मिल जाये कहीँ मालिक आसमाँ का,आस में इसी जिये जा रहा हूँ।                                                                                                                                       अरिनास शर्मा  

Thursday, December 18, 2025

ज़हर-शहर

"ऐसी भी क्या मज़बूरी थी कि गाँव-शहर में भाग गया ज़हर भरी हवा के समन्दर में ख़ुद को डुबा दिया,रोटी तो गाँव में भी थी पर पीज़ा क्यों इस पर भारी पड़ गया,कौन-सी सुविधाओं ने युवाओं को आकर्षित किया कि घर भी छोड़ा अपनों को तोड़ा देकर आँसू चला गया,घर था काम था स्कूल था बाज़ार था सिनेमा था अब तो मॉल ने भी दस्तक दे दी यहाँ पर फ़िर किस ज़रूरत ने मजबूर किया जो घर तुमको घर अपना न लगा,ज़हर भर दिया है हवाओं में क्यों अपने-अपनों के बन गये दुश्मन हैं,ऐसी क्या मज़बूरी है जो वापस तुझको आने नहीँ दे रही है,कर्जे में डुबोता तू ख़ुद को क्यों ख़ुद पर इतना बोझ बड़ाता,न घर अपना न अपना समाज न अपने लोग न अपना हमराज़,बीच में फ़िर भी इन लोगों के क्यों मिलता है इतना सुकून,घर आ जा वक़्त है अब भी सब कुछ है यहाँ भी मोह-माया से रह तू दूर,देर न इतनी कहीँ हो जाये छत भी छुटे अपने भी हो जायें दूर,रुक जा सम्भलज़ा किसकी बातों में जीवन को उलझाए है,छिन जायेगा बिक़ जायेगा ख़ाली हाथ खड़ा होगा जब तू,सब से पहले तेरे क़रीबी भागेंगे तुझको तेरे ही छोड़ कर जायेंगे,जिनके लिये तू ख़ुद को मिटा रहा है जिनके लिये तू अपनों को ठुकरा रहा है ये भी तुझको मिल न पायेंगे,तेरे ग़म में तुझसे पहले जीते जी ये तर जायेंगे,कर ले कोशिश एक आख़री तू बच जायेगा तेरा बृद्ध जीवन,वरना क्या है गाँव-शहर भी मोह-माया का जँगल है,कर फ़ैसला तू ही अब घर में रहना है या जँगल में।"                                                                                अरिनास शर्मा                                                                      ------------------------                                                                  -------------------------

Sunday, December 7, 2025

डॉक्टर श्री उदय सरन अरमान

7 जून 1932 में ग्राम मुड़िया राजा तहसील बिलारी जिला मुरादाबाद में एक ब्राह्मण परिवार में जन्में श्री मुंशी लाल शर्मा जी केछोटे पुत्र श्री उदय सरन शर्मा जी के विषय में क़िसी ने सोचा भी नहीँ होगा,कि आगे चलकर इस ग्राम के साथ-साथ अपने पिता औऱ तहसील बिलारी का नाम रौशन करेगा। अंग्रेजों के ज़माने में पुलिस में रहे हवलदार के बेटे ने इस मुक़ाम तक पहुँचने के लिये बेहद कड़वे अनुभवों के साथ कठिन मार्ग पर चलते हुये जो मुक़ाम हांसिल किया वो अपने-आप में एक मिसाल बन गया।                                                                                         डॉक्टर उदय सरन जी ने युवा अवस्था में एक साधारण से स्कूल में बतौर अध्यापक नोकरी की,परन्तु उनकी मंज़िल तो कहीँ दूर थी।कुछ समय बाद अपनी नोकरी से त्यागपत्र दे दिया।बाद में क़स्बे के एक चिकित्सक के यहाँ कुछ समय बतौर कम्पाउंडर कार्य किया,मग़र उसमें भी जब मन नहीँ लगा तो वहाँ से भी चले आये औऱ बाक़ी की शिक्षा पूरी की।साथ ही उर्दू की शिक्षा के साथ आपको कहानियाँ औऱ शायरी का भी शौक लग गया।एक समय ऐसा भी आया कि आपकी रुचि को देखते हुए आपके गुरु जी ने लंदन जा कर शिक्षा लेने का भी इंतज़ाम कर दिया,परन्तु माता-पिता कि आज्ञा न मिलने के कारण यहीँ रुककर बाक़ी की शिक्षा पूरी की।                                  सन 1954 में आपने गाँव छोड़कर कस्वा बिलारी में थोड़ी ज़मीन ख़रीद कर अपना छोटा क्लीनिक खोल लिया।एक 12कड़ियों का कमरा औऱ सामने छप्पर डालकर बैठना शुरू कर दिया।यही दिन जीवन का टर्निंग डे बन गया।फ़िर क़भी पीछे मुड़कर नहीँ देखा।एक सफ़ल चिकित्सक के साथ-साथ सफ़ल किसान के रूप में भी अग्रसर रहे।धीरे-धीरे औऱ ज़मीनें ख़रीदीं, चिकित्सा के साथ खेती करना छोटी घर में गऊ शाला जिनका कार्य एक नोकर के सहयोग से ख़ुद करना औऱ भोर के समय अपनी शेरो-शायरी के शौक को निरंतर ज़ारी रखा।                            उर्दू की अच्छी जानकारी के कारण आज उर्दू के शायरों के बीच में अच्छा मुक़ाम हासिल किया है।आपके द्वारा लिखीं क़िताबों की सूची भी काफ़ी लम्बी है।                                                            सन1950 से लिखीं किताबें क्रमशा "डकैत"औऱ "तलवार"नाविल के रूप में सन 1951 में लिखी क़िताब "कुँआरी माँ"नाविल के रूप में,सन1953 में लिखी"शिवाजी"हिंदी खंड काव्य के रूप में,सन1956 में लिखी"महाभारत"काव्य के रूप में,सन1957 में लिखी"अभागा"काव्य के रूप में,सन1958 में लिखी"बेगाना"नाविल के रूप में,सन1959 में लिखी"हक़ परस्ती"नाविल के रूप में,सन1962 में लिखी"अंजाम"नाविल के रूप में,सन1963 में लिखी"ठोकर"हिंदी बाल काव्य के रूप मे,"सत्कार"औऱ सन1964 में लिखी"ज़माना"नाविल के रूप में,सन1971 में लिखी"करमेती का इतिहास"काव्य ग्रन्थ के रूप में,सन1972 में लिखी"जलता देश झुलसती धरती"नाविल के रूप में,सन1982 में लिखी"मुक्तक",सन1983 में लिखी"लाज़बाब"कहानी के रूप में,सन1984 में लिखी"लीख से हटकर"कहानी के रूप में,सन1984 में ही लिखी"उघड़ी काया"कहानी के रूप में,सन1986 में लिखी"इशारा"हिंदी में,सन1998 में लिखी"सनलिकत शेर"सन1998 में ही लिखी"उजले-दामन"कहानी सँग्रह के रूप में,सन1994 में लिखी"प्रीतांजली"काव्य गीत के रूप में,सन1998में लिखी"नाव भवँर की ओर"हिंदी निबन्ध के रूप में,सन1998 में ही लिखी"ज़र्रा-ज़र्रा सूरज"उर्दू कहानी के रूप में लिखीं।इनके अलावा तीन भाषाओं में छपी "किरणों के पद चिन्ह" "मुसलमान का मंदिर"व"आशीर्वाद"चर्चित अन्य किताबें हैं।।                                                                                                         उर्दू में लिखीं अन्य किताबें,"राजो-नियाज़"सन1974 में,"साज़ो-आवाज़"सन1975 में लिखीं।सन1973 में लिखी"अरमाने-दिल"मुक्तक के रूप में,सन1979में लिखी"आईने"मुक्तक के रूप में,सन1982में लिखी"मानसरोवर"हिंदी उर्दू इंग्लिश में छपी,सन1984 में लिखी"हर बार कहा दिल ने"कहानी सँग्रह के रूप में उर्दू भाषा मे छपी,सन1997 में छपी"धूप के टुकड़े"कहानी के रूप में उर्दू में छपी।                                                        आपकी एक कहानी अगस्त सन 1983 में B.B.C. लंदन पर रिकॉर्ड की गई।कहानी का नाम"लाज़बाब"है।आपने सन1983 में लंदन कवि सम्मेलन में"सदारद"की।अपने सन1984 में लखनऊ में गैर मुस्लिम उर्दू राइटर्स कॉन्फ्रेंस में भी शिरकत की।आपकी कहानियाँ औऱ काव्य 28 फरवरी सन 1981 में आकाशवाणी रामपुर से भी पड़ी गईं।आपकी दो किताबों"मानसरोवर"औऱ"हर बार कहा दिल ने"को उत्तरप्रदेश उर्दू अकाडमी औऱ बिहार उर्दू अकाडमी से पुरुस्कृत कर सम्मानित किया गया है।हाल ही में आपको "धूप के टुकड़े"औऱ चालीस वर्षों से उर्दू साहित्य में अपना योगदान देने के उपलक्ष्य इंटरनेशनल लेबिल का 9 मार्च 1999 को भारत के सर्वश्रेष्ठ उर्दू के कहानीकार के रूप में मोहम्मद रिसालुद्दीन साहिब "लंदन" के पुण्य हाथों से दिल्ली ग़ालिब एडोटोरियम माता सुंदरी लेन में आयोजित एक भव्य समारोह में मुंशी प्रेम चंद एवार्ड से सम्मानित किया गया।आपको लाइफ़टाइम एचीममेन्ट एवार्ड एवं 5100 रुपये की नक़द राशी देकर मुरादाबाद में माननीय एम पी साहब हाफ़िज़ मोहम्मद सिद्दीक़ी के हाथों सम्मानित किया गया।                                                                                            मुरादाबाद जिले की तहसील बिलारी का का नाम रौशन करने के लिये आपने अपनी लेखनी द्वारा जो कार्य किया औऱ उम्र भर सफ़ल चिकित्सक के रूप में समाज की सेवा की ,वो वाकई सरहानीय कार्य है।वर्ष 2015 में ब्रह्मलीम के बाद भी उनकी सेवाओँ को याद किया जाता है।स्टेशन रोड पर उनके नाम से उदय नगर कालोनी का निर्माण वर्ष 2010-11 में हुआ।जो आज विशाल रूप ले चुकी है।आप सदैव सभी परिवार के सदस्यों एवम पूरे छेत्र वासियों के दिल में अपनी जगह बनाए हुए हैं।डॉक्टर उदय सरन 'अरमान ' के सम्पूर्ण कार्यकाल को संछिप्त में लाने का एक प्रयास किया गया है।आने वाली पीड़ी के लिये वे सदैव प्रेणना स्रोत रहेंगे।                                                  लेख़क                                                                                 --------------                                                                   अरिनास शर्मा  ,बिलारी।।                                                      ----------------------------------------                                                ------------------------------------------