Thursday, December 18, 2025

ज़हर-शहर

"ऐसी भी क्या मज़बूरी थी कि गाँव-शहर में भाग गया ज़हर भरी हवा के समन्दर में ख़ुद को डुबा दिया,रोटी तो गाँव में भी थी पर पीज़ा क्यों इस पर भारी पड़ गया,कौन-सी सुविधाओं ने युवाओं को आकर्षित किया कि घर भी छोड़ा अपनों को तोड़ा देकर आँसू चला गया,घर था काम था स्कूल था बाज़ार था सिनेमा था अब तो मॉल ने भी दस्तक दे दी यहाँ पर फ़िर किस ज़रूरत ने मजबूर किया जो घर तुमको घर अपना न लगा,ज़हर भर दिया है हवाओं में क्यों अपने-अपनों के बन गये दुश्मन हैं,ऐसी क्या मज़बूरी है जो वापस तुझको आने नहीँ दे रही है,कर्जे में डुबोता तू ख़ुद को क्यों ख़ुद पर इतना बोझ बड़ाता,न घर अपना न अपना समाज न अपने लोग न अपना हमराज़,बीच में फ़िर भी इन लोगों के क्यों मिलता है इतना सुकून,घर आ जा वक़्त है अब भी सब कुछ है यहाँ भी मोह-माया से रह तू दूर,देर न इतनी कहीँ हो जाये छत भी छुटे अपने भी हो जायें दूर,रुक जा सम्भलज़ा किसकी बातों में जीवन को उलझाए है,छिन जायेगा बिक़ जायेगा ख़ाली हाथ खड़ा होगा जब तू,सब से पहले तेरे क़रीबी भागेंगे तुझको तेरे ही छोड़ कर जायेंगे,जिनके लिये तू ख़ुद को मिटा रहा है जिनके लिये तू अपनों को ठुकरा रहा है ये भी तुझको मिल न पायेंगे,तेरे ग़म में तुझसे पहले जीते जी ये तर जायेंगे,कर ले कोशिश एक आख़री तू बच जायेगा तेरा बृद्ध जीवन,वरना क्या है गाँव-शहर भी मोह-माया का जँगल है,कर फ़ैसला तू ही अब घर में रहना है या जँगल में।"                                                                                अरिनास शर्मा                                                                      ------------------------                                                                  -------------------------

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