Tuesday, January 13, 2026

हिमालय

मेरे बाऊजी"पिताजी"                                                                                           हमारे गौरव का प्रतीक हमारी सुरक्षा की गारंटी हमारा हिमालय पर्वत जिस तरह हमारे लिये महादेव ने रचा है ठीक उसी प्रकार मेरे जीवन के लिये एक अनमोल भेंट थे मेरे बाऊजी।         वैसे तो भेंट देकर वापिस नहीँ ली जाती है परंतू परमपितापरमेश्वर ने मेरे बाऊजी को भेजा भी औऱ वापस भी बुला लिया।बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो पिता की मौजूदगी को जी नहीँ पाते हैं,वो ख़ुद को इतना सुरक्षित महसूस करते हैं की बस मौज मस्ती में ही सारा जीवन व्यर्थ कर देते हैं,वो क़भी पीछे मुड़कर भी देखना नहीँ चाहते की जिस व्यक्ति विशेष के कारण हम इतने प्रसन्न हैं उसके प्रति भी हमारा कुछ दायित्व है,हाँ उन्हें झटका तब लगता है जब एक दिन अचानक उन्हें उनके न होने का एहसास होता है औऱ विडम्बना तो ये है कि बड़ी बेरहमी से वो ये कह कर पल्ला झाड़ लेते हैं कि जो आया है उसे एक दिन जाना ही पड़ता है,कोई नई बात नहीँ है।दुर्भाग्यवश ऐसे लोगों की गिनती आज हमारे समाज में बड़ती जा रही है।                                                        असल में हम अपने रिश्तों को जीना उन्हें महसूस करना भूल गये हैं।आज दुर्भाग्य से मेरे बाऊजी मेरे साथ नहीँ हैं फ़िर भी मुझे एहसास होता है कि वो मेरे साथ ही हैं।वो जब हमारे बीच थे तो हर पल मैं उन्हें जीता था उन्हें गोर से देखता रहता था औऱ अपने महादेव से यही प्रार्थना करता था कि ये हमेशा मेरे साथ रहने चाहिये।उनका होना ही मेरे लिये पूर्ण सुरक्षा सुख समृद्धि की गारंटी थी।पिता का साथ न होने का अर्थ मतलब आप ऐसे घर मे रह रहे हैं जिसकी छत तो है मगर दीवारें नहीँ है वो क़भी भी आपके सर पर गिर सकती है।वो लोग बहुत भाग्यशाली हैं जिन्हें पिता का सानिध्य प्राप्त है।वो समझ नहीँ रहे हैं कि कितनी अनमोल आत्मा उनके साथ खड़ी है।                  जो लोग अपने पिता को नहीँ समझते जो उनकी कद्र नहीँ करते जो उनके होते हुये भी उनसे दूर रहना पसंद करते हैं वो नहीँ जानते कि वो कितने दुर्भाग्यशाली हैं।प्रभु से हमेशा कुछ माँगा नहीँ जाता है फ़िर भी हम चाहते हैं कि प्रभु का आशीर्वाद उनका साथ हमेशा बना रहे,इसी लिये हम बार-बार मंदिरों में भागते हैं न।बस इसी तरह पिता को भी समझना औऱ जीना चाहिए।हमेशा ये भाव नहीँ होना चाहिये कि पिता से कुछ मिले तभी वो अच्छे पिता हैं तभी हम उनकी सेवा करेंगे।मग़र आज के संस्कार न जाने कैसे हैं कि बच्चों को अपने माता-पिता ही या तो ज़हर लगने लगते हैं जा सिर्फ़ उनकी ज़रूरते पूरी करने की चीज़ बन कर रह गये हैं औऱ यही नई पीड़ी के पतन का कारण भी है।गाड़ी के दोनों पहिये ही छोटे बड़े हैं तो गाड़ी का संतुलन कैसे ठीक रहेगा।।                                                                               अरिनास शर्मा                                                                         -------------------

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