Thursday, September 19, 2024

सादगी

दस हज़ार करोड़ के मालिक आनन्द शर्मा का बेटा अपनी अमीरी से परेशान होकर अपने पिता का घर व दौलत छोड़ कर एक छोटी बस्ती में जा कर रहने लगता है।                                                                     विजय वहीं के एक गैराज में काम करने लगता है।बस्ती की एक लड़की प्रिया विजय से प्यार करने लगती है मग़र विजय उससे दूरी बनाकर रहता है।आनन्द शर्मा के बिज़निस पार्टनर अनवर खान बिज़निस हड़पने के लिए  शर्मा के बेटे को मारना चाहता है।कम्पनी का एक बन्दा जोकि विजय का ख़ास है,उसे इस षड्यंत्र के वारे में बता देता है,औऱ सावधान रहने को कहता है।एक दिन गैराज में कुछ लोग कार ठीक करवाने आते हैं, उन्हें विजय पर शक हो जाता है।                                               एक आदमी अनवर को बता देता है कि एक लड़का यहाँ गैराज में काम करता है जो विजय से बहुत मिलता है।अनवर उस पर नज़र रखने को कहता है।एक दिन कुछ गुंडे प्रिया का अपहरण करने की कोशिश करते हैं।विजय अचानक पहुँच जाता है औऱ प्रिया को बचा लेता है।प्रिया विजय की असलियत से बेख़बर है।विजय एक दिन अपने पिता को अनवर अंकल से सावधान रहने को कहता है औऱ उनके मनसूबे के बारे में बताता है।                                         शर्मा को इस ख़बर से झटका लगता है।शर्मा अपने बेटे की सेफ़्टी के लिए कुछ बॉडीगार्ड लगा देता है।एक दिन विजय अपने कमरे मे चाय बना रहा था तभी प्रिया आकर पूछती है कि वो इतना चुप औऱ उससे दूर क्यों रहता है।"तुम बहुत अच्छी लड़की हो मग़र मेरे बहुत दुश्मन हैं औऱ मैं नहीँ चाहता कि मेरे कारण तुम बेमौत मारी जाओ,इस लिए बेहतर होगा तुम मुझसे दूर रहो"विजय उससे जाने को कहता है।प्रिया ग़ुस्से में चली जाती है।एक दिन प्रिया विजय से मिलने गैराज पहुँच जाती है,तभी अचानक कुछ लोग विजय पर हमला कर देते हैं, विजय भी भिड़ जाता है परंतु उसके पिता के भेजे बॉडीगार्ड उन बदमाशों को मार कर ग़ायब हो जाते हैं।                           पुलिस पहुँच जाती है औऱ बदमाशों की बॉडी एम्बुलेंस से भेज देता है।दरोग़ा बताता है कि वो चिंता न करे मुझे तुम्हारे पिता ने भेजा है।मै सब देख लुँगा।वो वहाँ से चला जाता है।गैराज का मालिक हैरान होकर विजय से पूछता है कि बदमाश कौन थे औऱ दरोगा तुम्हे कैसे जानता है।विजय गैराज मालिक औऱ प्रिया को एक केबिन में ले जाता है औऱ अपने वारे में सब सच बता देता है।गैराज मालिक माफ़ी मांगने लगता है,पर विजय उसे तसल्ली देता है कि वो सब ठीक कर देगा।प्रिया भी हैरान है,कि इतने अमीर बाप का बेटा इस छोटी सी वस्ती में उन सब के बीच रह रहा था।विजय प्रिया को देखकर मुस्कुराता है।                              अब विजय इस किस्से को खत्म करना चाहता है।वो ऑफ़िस में अपने मैनेजर को अपनी योजना बताता है।अनवर उधर अब पहले आनन्द को मारने की योजना बनाता है औऱ आनन्द को दूसरी फेक्ट्री में बहाने से बुलाता है,जहाँ उनके आदमी तैनात हैं।विजय पुलिस को अवगत कर देता है।पुलिस औऱ विजय भी पहुँच जाते हैं।लम्बी लड़ाई होती है औऱ अनवर पुलिस की गोली से मारा जाता है।उसके कुछ आदमी मारे जाते हैं औऱ बाक़ी को पुलिस गिरफ्तार कर लेती है।अंत मे विजय वापिस बस्ती जाकर प्रिया से पूछता है कि मुझसे शादी करोगी।प्रिया ख़ुशी से रो पड़ती है औऱ विजय से लिपट जाती है।यही कहानी का अंत है।

Saturday, September 7, 2024

क्रोध

अनन्तकाल से क्रोध आदमी के विनाश का,शत्रुता का कारण बना हुआ है।क्रोध से न क़िसी को क़भी कोई लाभ हुआ है न ही कोई उतपत्ति हुई है,फ़िर भी न जाने क्यों सत्य जानते हुये भी आदमी इस क्रोध रूपी राक्षस के कारण कितने प्रिये रिश्तों से हाथ धो बैठा है।                                     आज के काल में लालच,लेन-देन,उधारी,मज़बूरी औऱ न जानें कितने ऐसे कारण हैं जिस वजह से अपने-अपनों से दूर होते जा रहे हैं।व्यर्थ की मोहमाया के कारण आपस मे दीवारें खड़ी हो रहीं हैं।एक-दूसरे के साथ तो दूर पास-पास भी रहना गवारा नहीँ है।क़भी सोचा है कि हम किस दिशा में जा रहे हैं या हम अपने बच्चों को किस दिशा मे धकेल रहे हैं?ज़रा सोचिए।                 क्रोध के रहते अपना भविष्य अपने रिश्ते बिगाड़ने हैं या स्वम् को अपने बच्चों को बेहतर भविष्य अनमोल रिश्ते देने हैं।रुपये कमाये जाते हैं ख़र्च किये जाते हैं मग़र रिश्ते सिर्फ़ कमाये जाते हैं ख़र्च सिर्फ़ अपनों पर किये जाते हैं।तुम्हें रिश्ते चाहिये या दौलत।सोचना तुम्हें है।रिश्तों में ये भी हिसाब नहीँ ऱखते कि किसने कम किया या किसने ज्यादा किया,बस दोंनो हाथ खोल कर दिया जाता है।हिसाब तो केवल व्यापार में होता है औऱ जहाँ व्यापार होता है वहाँ रिश्ते नहीँ टिकते हैं।   समझ लो तो सब बच जायेगा वरना सब बिखर जायेगा।

पिता-सत्संग

सत्संग में जाकर बैठ जाओ या पिता के पास कुछ देर बैठ जाओ,बात एक ही है,मग़र विडम्बना है कि हम अमल किसी की बात पर भी नहीँ करते हैं।बेटियाँ विवाह उपरांत भी अपने माँ-बाप को नहीँ छोड़ पाती हैं औऱ बेटा अपने माँ-बाप को तुरंत त्याग देता है।बेटे को अपने पिता का घर जेल लगने लगता है तो बहु को ससुराल पक्ष के दुश्मन नज़र आने लगते हैं।सास-ससुर की हर बात लाख रुपये की होती है तो पिता की बातों में व्यंग नज़र आने लगता है।अपने ही भाई-बहन आँखों मे चुभने लगते हैं तो साला-साली घर का ताज़ नज़र आने लगते हैं।                           दुर्भाग्य तो ये कि अपनी औलाद की परवरिश भी ससुरालियों के मार्गदर्शन में होती है।पत्नी की कही हर बात पत्थर की लक़ीर होती है औऱ अपनी माँ बक-बक करती नज़र आती है।पिता को बेज़्ज़त करने में पल नहीँ गवांते हैं,पत्नी से तू भी कह दिया तो कहानी ख़त्म।अगर बेटा बाप के पास कुछ पल गुज़ारे तो उसे बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है,उसकी समस्याओं का समाधान निकल सकता है।पिता वो ज्ञान दे सकता है जो कालेज की किताबों में नहीँ मिल सकता है,क्योंकि पिता के पास जीवन के अनुभव का भंडार होता है,मग़र उससे ज्यादा अच्छा उसे पत्नी से राय लेना ज्यादा अच्छा लगता है औऱ पत्नी तुरन्त अपने मायके फ़ोन कर राय लेकर पति को फॉरवर्ड कर देती है।                                                                     आज-कल का चलन हो गया है कि बस अपने लोग अपने नहीँ हैं बाक़ी सारी दुनियाँ अपनी है।सास-ससुर को माँ-बाप समझने वाले अपने माँ-बाप को खो देते हैं, ससुराल को घर समझने वाले अपने घर से भी वंचित हो जाते हैं।एक दिन ऐसा आता है कि ससुराल से भी उनका परित्याग हो जाता है,माँ-बाप भी खो बैठते हैं।बुरी संगत से अच्छा है कि क़िसी गाँव के बुज़ुर्ग के पास रोज़ एक घण्टा बिताओ तो क़िसी सत्संग में जानें की ज़रूरत नही पड़ेगी,पिता को समझो पिता से बातें करो क़िसी के मशहरे की ज़रूरत नही पड़ेगी।जितनी जल्दी सवेरा हो जायेगा जीवन का अंधकार उतनी जल्दी दूर हो जायेगा।         अगर काटें औऱ फ़ूल का फ़र्क समझते हो तो अपने-पराये का औऱ दुश्मन-दोस्त का भी फ़र्क समझना होगा,वर्ना सिर्फ़ तुम होंगे मग़र आस-पास कोई औऱ तुम्हारा नज़र नहीँ आयेगा, क्योंकि भृम के रिश्ते तब-तक तुम्हें खोखला कर चुके होंगे।समझदार को ज्यादा समझने की ज़रूरत नहीँ होती है।