Saturday, September 7, 2024
पिता-सत्संग
सत्संग में जाकर बैठ जाओ या पिता के पास कुछ देर बैठ जाओ,बात एक ही है,मग़र विडम्बना है कि हम अमल किसी की बात पर भी नहीँ करते हैं।बेटियाँ विवाह उपरांत भी अपने माँ-बाप को नहीँ छोड़ पाती हैं औऱ बेटा अपने माँ-बाप को तुरंत त्याग देता है।बेटे को अपने पिता का घर जेल लगने लगता है तो बहु को ससुराल पक्ष के दुश्मन नज़र आने लगते हैं।सास-ससुर की हर बात लाख रुपये की होती है तो पिता की बातों में व्यंग नज़र आने लगता है।अपने ही भाई-बहन आँखों मे चुभने लगते हैं तो साला-साली घर का ताज़ नज़र आने लगते हैं। दुर्भाग्य तो ये कि अपनी औलाद की परवरिश भी ससुरालियों के मार्गदर्शन में होती है।पत्नी की कही हर बात पत्थर की लक़ीर होती है औऱ अपनी माँ बक-बक करती नज़र आती है।पिता को बेज़्ज़त करने में पल नहीँ गवांते हैं,पत्नी से तू भी कह दिया तो कहानी ख़त्म।अगर बेटा बाप के पास कुछ पल गुज़ारे तो उसे बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है,उसकी समस्याओं का समाधान निकल सकता है।पिता वो ज्ञान दे सकता है जो कालेज की किताबों में नहीँ मिल सकता है,क्योंकि पिता के पास जीवन के अनुभव का भंडार होता है,मग़र उससे ज्यादा अच्छा उसे पत्नी से राय लेना ज्यादा अच्छा लगता है औऱ पत्नी तुरन्त अपने मायके फ़ोन कर राय लेकर पति को फॉरवर्ड कर देती है। आज-कल का चलन हो गया है कि बस अपने लोग अपने नहीँ हैं बाक़ी सारी दुनियाँ अपनी है।सास-ससुर को माँ-बाप समझने वाले अपने माँ-बाप को खो देते हैं, ससुराल को घर समझने वाले अपने घर से भी वंचित हो जाते हैं।एक दिन ऐसा आता है कि ससुराल से भी उनका परित्याग हो जाता है,माँ-बाप भी खो बैठते हैं।बुरी संगत से अच्छा है कि क़िसी गाँव के बुज़ुर्ग के पास रोज़ एक घण्टा बिताओ तो क़िसी सत्संग में जानें की ज़रूरत नही पड़ेगी,पिता को समझो पिता से बातें करो क़िसी के मशहरे की ज़रूरत नही पड़ेगी।जितनी जल्दी सवेरा हो जायेगा जीवन का अंधकार उतनी जल्दी दूर हो जायेगा। अगर काटें औऱ फ़ूल का फ़र्क समझते हो तो अपने-पराये का औऱ दुश्मन-दोस्त का भी फ़र्क समझना होगा,वर्ना सिर्फ़ तुम होंगे मग़र आस-पास कोई औऱ तुम्हारा नज़र नहीँ आयेगा, क्योंकि भृम के रिश्ते तब-तक तुम्हें खोखला कर चुके होंगे।समझदार को ज्यादा समझने की ज़रूरत नहीँ होती है।
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