Friday, January 24, 2025
विधि का विधान।
एक-एक दाना चुन-चुन कर लाती है चिड़िया धीरे-धीरे बच्चे बड़े होते हैं औऱ एक दिन अचानक उड़ कर दूसरे पेड़ पर जा बैठते हैं औऱ चिड़िया बेचारी देखती रह जाती है।जिस घर में बच्चे जन्म लेते हैं बड़े होते हैं लायक बनते हैं औऱ अचानक एक दिन वही घर छोड़कर वो चले जाते हैं, माँ-बाप बेचारे देखते रह जाते हैं औऱ बच्चे पीछे मुड़कर भी नहीँ देखते हैं, शायद यही विधि का विधान है,यही प्रकृति का नियम है।ये दुनियाँ ये जीवन शायद इसी तरह चलता है।जीव;जंतु हों या समस्त मानव जाति हो सब पर एक ही नियम लागू है,मिलना है बिछड़ना है आना है जाना है यहाँ घर किसका है ये तो एक मुसाफिरखाना है,भृम तो क़िसी का रहा ही नहीँ मालिक तो कोई बना ही नहीँ, बस हम तो वो कलाकार हैं जो अपने-अपने क़िरदारों को निभाने आते हैं औऱ बस एक कट की आवाज़ आती है वापस अपने घर अपने परमपिता परमेश्वर के चरणों मे चले जाते हैं, यही तो विधि का विधान है,मग़र हम मूर्ख मानव मानने को तैयार ही नहीँ होते हैं कि यहाँ कोई अपना नहीँ है कोई रिश्ता नहीँ है कुछ भी तो हमारा नहीँ है,बस लड़े जा रहे हैं, मरे जा रहे हैं, हाय-हाय-काय-काय, क्या लाया क्या ले गया ,सब जानें हैं पर माने कोई न है।सच तो ये कि मौत तो सिर्फ़ बदनामी का ताज़ पहनकर आई है असल दर्द तो कम्बख़्त ये ज़िन्दगी दे रही है,एक पल हँसाती है तो अनेकों पल रुलाजती है,फ़िर भी इतनी मोहब्बत है इस खुदगर्ज ज़िन्दगी से कि बार-बार इसे जीने को मन करता है,लगता है जैसे हम-सब कोई अपराधी हैं जो जेल रूपी इस दुनियाँ में अपने-अपने ज़ुर्म की सज़ा काटने के लिए भेजे गए हैं, जिसकी सज़ा पूरी हो जाती है उसे वापस बुला लिया जाता है।ये कैसा सच है जीवन का,ये कैसा भृम है मानव का,ये कैसा दर्द है घर का जो क़भी ख़तम ही नहीँ होता है,जीवन होता है मग़र कुछ भी तो नहीँ होता है।शायद यही प्रकृति का नियम है ऐसे ही उसका संचालन होता है,ऐसे ही वो वक़्त-वक़्त पर वक़्त की मार से हमें सजा देता रहता है,औऱ हम नासमझ लोग रोते हैं गिड़गिड़ाते हैं फ़िर से कम्बख़्त यही ज़िन्दगी माँगते हैं औऱ फ़िर से एक नया भृम लेकर जीना शुरू कर देते हैं दर्द भरी ज़िन्दगी मग़र खूबसूरत सी ज़िन्दगी।न जाने इतना लगाव क्यों है इससे?शायद।यही तो विधि का विधान है। अरिनास शर्मा,बिलारी।
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