पर्वत
Saturday, January 3, 2026
जंग
जंग सरहद से कब जंग शुरू होती है,सरहदें होती हीं कहाँ हैं,जंग तो घर में घर की चार दीवारों से शुरू होती है,आपसी मत भेद जंग का पहला बीज बोते हैं,जिसे पनपने से घर के बड़े भी नहीँ रोक पाते हैं,कारण कोई भी हो सरहदें खिंचनी शुरू हो ही जातीं हैं,घर बटते हैं ज़मीनें बंटती हैं यही प्रकिरिया इतना भयानक रूप ले लेती है कि एक दिन देश बट जाता है,जंग तब असली शुरू होती है,सरहदें जंग रोकने का काम नहीँ करतीं हैं,सत्ता में बैठे बड़े सत्ता धारी अपनी-अपनी ज़मीन को बचाने के लिये जंग को बड़ा रूप देनें में माहिर हो जाते हैं,पहले घर के टुकड़े फ़िर देश के टुकड़े फ़िर जाती-वाद के बहाने नागरिकों के टुकड़े फ़िर बोट के लिये अलग-अलग मंच तैयार हो जाते हैं,कौन-कब जंग लड़ना चाहता था कौन कब जंग लड़ना चाहता है,सभी को अलग ज़मी चाहिये सभी शांति का दूत बने घूमते भी हैं,हम शांति प्रिये लोग हैं हमें जंग से क्या लेना-देना,न जाने फ़िर भी किस वज़ह से किसकी वज़ह से सरहदें बन गईं,न जानें अब कौन-कब-कैसे फ़िर से एक घर एक छत ऐसी बनाएगा जिसके नीचे सभी फ़िर से एक साथ रहेंगे,कहते हैं दुश्मन कोई क़िसी का नहीँ होता है,सभी अपनी-अपनी ज़मी के लिये शहीद होते हैं,ये ज़मी तो एक टुकड़ा ही थी न,फिर इतने टुकड़े किसने किये औऱ किसने करने दिये,उस माँ का क्या क़सूर जिसका बेटा ज़मी के नाम पर शहीद हो गया,उस पत्नी का क्या क़सूर जिसका पति एक ज़मी के नाम पर शहीद हो गया,न जानें कितने रिश्ते शहीद हुए न जानें कितने घरों के चिराग़ बुझ गये,क्या क़िसी के पास अपने-अपने शहीदों की शहादत का हिसाब है,क्या कोई इस बात पर मोहर लगा सकता है कि भविष्य में जमी के नाम पर अब कोई जंग नहीँ होगी,अब क़िसी का बेटा पति पिता चिता पर जमी के नाम पर नहीँ सोएगा,जंग होती तो भूख के किये होती जंग होती तो शिक्षा के लिए होती जंग होती तो रोज़गार के लिए होती जंग होती तो तरक्की के लिए होती,जंग करने के लिए कई बहाने कई कारण हो सकते थे,मग़र हम अकेले हर फ़ैसला करने को कहाँ आज़ाद होते हैं,मग़र हम कब कहाँ क़िसी को अपना बनाने के लिए सीने से लगाते हैं,हमारी तो ख़ुद की आस्तीनों में इतने साँप पल रहे हैं कि न जानें वो कब हम ही को न डस लें,पहले ख़ुद की सफ़ाई करनी होगी पहले आस्तीनों के सापों को एक-एक कर कुचलना होगा,जब-तक हम सुरक्षित महसूस नहीँ करेंगे तब-तक अन्य को कैसे सुरक्षा का आशवासन दे सकते हैं, तो इस बात से तो निश्चिन्त रहिये की जंग जीते-जी तो ख़त्म नहीँ होगी,सरहदें बड़ती रहेंगी जंगे होती रहेंगी,देश बनते-टूटते रहेंगे,शांति का लॉलीपॉप मिलता रहेगा,धैर्य रखिये।। अरिनास शर्मा ----------------------
Friday, December 26, 2025
वक़्त
आज-कल दर्द में डूबा हुआ फ़िरता हूँ,टूटे हुये दिल को संभाले फ़िरता हूँ,बारिशें चाहें हों जितनी भी,आँसुओं से आँखें धो लेता हूँ,गहरा है अंधेरा रात का,तारों से मन बहला लेता हूँ,दूर होते मेरे अपने मुझ ही से,गैरों को अपना बना लेता हूँ,चंद रोज़ से ही हुए हैं हाथ ख़ाली मेरे,अब तो साये को भी अपने पीछे छोड़ चला हूँ,राहें मेरी मंजिल मेरी पर्वत सी मग़र अड़चन मेरी,जोश बहुत है मग़र ज़िस्म से हार बैठा हूँ,दुनियाँ बड़ी समन्दर जितनी,उम्मीद ज़रा सी मग़र लिये बैठा हूँ,डोलता-फ़िरता जैसे आवारा लहरों पर नाव कोई,कौन पहुँचाये किनारे पर,एक माँझी ढूंढता फ़िरता हूँ,क्या होगी आरज़ू अब जीवन की,बस साँसें अपनी संभाले फ़िरता हूँ,मुहँ मोड़ लेते हैं अपने भी,मैं हँसता था इन बातों पर अक़्सर,ज़िन्दगी समझा रही है,क़िताब के हर पन्ने का सबक,आँखों मे देखकर भी कैसे आँखे चुरा लेते हैं अपने,ज़हर पीकर दवा खोज रहा हूँ,बेमुरव्वत है दुनियाँ आँसू का मोल कुछ नही है,रो-रो कर आँखों को समझा रहा हूँ,कोई नहीँ गर्दीष का गवाह सिवाय मेरी तन्हाई के,ख़ामोशी से बैठ कर ख़ामोशी से ही बात किये जा रहा हूँ,बस सफ़र है बाक़ी जो वो भी गुज़र जायेगा,बस गुंगनाये जा रहा हूँ मुस्कुराए जा रहा हूँ,हाँ-तकलीफ़ तो दे रही है ज़िन्दगी बहुत मुझे,मिल जाये कहीँ मालिक आसमाँ का,आस में इसी जिये जा रहा हूँ। अरिनास शर्मा
Thursday, December 18, 2025
ज़हर-शहर
"ऐसी भी क्या मज़बूरी थी कि गाँव-शहर में भाग गया ज़हर भरी हवा के समन्दर में ख़ुद को डुबा दिया,रोटी तो गाँव में भी थी पर पीज़ा क्यों इस पर भारी पड़ गया,कौन-सी सुविधाओं ने युवाओं को आकर्षित किया कि घर भी छोड़ा अपनों को तोड़ा देकर आँसू चला गया,घर था काम था स्कूल था बाज़ार था सिनेमा था अब तो मॉल ने भी दस्तक दे दी यहाँ पर फ़िर किस ज़रूरत ने मजबूर किया जो घर तुमको घर अपना न लगा,ज़हर भर दिया है हवाओं में क्यों अपने-अपनों के बन गये दुश्मन हैं,ऐसी क्या मज़बूरी है जो वापस तुझको आने नहीँ दे रही है,कर्जे में डुबोता तू ख़ुद को क्यों ख़ुद पर इतना बोझ बड़ाता,न घर अपना न अपना समाज न अपने लोग न अपना हमराज़,बीच में फ़िर भी इन लोगों के क्यों मिलता है इतना सुकून,घर आ जा वक़्त है अब भी सब कुछ है यहाँ भी मोह-माया से रह तू दूर,देर न इतनी कहीँ हो जाये छत भी छुटे अपने भी हो जायें दूर,रुक जा सम्भलज़ा किसकी बातों में जीवन को उलझाए है,छिन जायेगा बिक़ जायेगा ख़ाली हाथ खड़ा होगा जब तू,सब से पहले तेरे क़रीबी भागेंगे तुझको तेरे ही छोड़ कर जायेंगे,जिनके लिये तू ख़ुद को मिटा रहा है जिनके लिये तू अपनों को ठुकरा रहा है ये भी तुझको मिल न पायेंगे,तेरे ग़म में तुझसे पहले जीते जी ये तर जायेंगे,कर ले कोशिश एक आख़री तू बच जायेगा तेरा बृद्ध जीवन,वरना क्या है गाँव-शहर भी मोह-माया का जँगल है,कर फ़ैसला तू ही अब घर में रहना है या जँगल में।" अरिनास शर्मा ------------------------ -------------------------
Sunday, December 7, 2025
डॉक्टर श्री उदय सरन अरमान
7 जून 1932 में ग्राम मुड़िया राजा तहसील बिलारी जिला मुरादाबाद में एक ब्राह्मण परिवार में जन्में श्री मुंशी लाल शर्मा जी केछोटे पुत्र श्री उदय सरन शर्मा जी के विषय में क़िसी ने सोचा भी नहीँ होगा,कि आगे चलकर इस ग्राम के साथ-साथ अपने पिता औऱ तहसील बिलारी का नाम रौशन करेगा। अंग्रेजों के ज़माने में पुलिस में रहे हवलदार के बेटे ने इस मुक़ाम तक पहुँचने के लिये बेहद कड़वे अनुभवों के साथ कठिन मार्ग पर चलते हुये जो मुक़ाम हांसिल किया वो अपने-आप में एक मिसाल बन गया। डॉक्टर उदय सरन जी ने युवा अवस्था में एक साधारण से स्कूल में बतौर अध्यापक नोकरी की,परन्तु उनकी मंज़िल तो कहीँ दूर थी।कुछ समय बाद अपनी नोकरी से त्यागपत्र दे दिया।बाद में क़स्बे के एक चिकित्सक के यहाँ कुछ समय बतौर कम्पाउंडर कार्य किया,मग़र उसमें भी जब मन नहीँ लगा तो वहाँ से भी चले आये औऱ बाक़ी की शिक्षा पूरी की।साथ ही उर्दू की शिक्षा के साथ आपको कहानियाँ औऱ शायरी का भी शौक लग गया।एक समय ऐसा भी आया कि आपकी रुचि को देखते हुए आपके गुरु जी ने लंदन जा कर शिक्षा लेने का भी इंतज़ाम कर दिया,परन्तु माता-पिता कि आज्ञा न मिलने के कारण यहीँ रुककर बाक़ी की शिक्षा पूरी की। सन 1954 में आपने गाँव छोड़कर कस्वा बिलारी में थोड़ी ज़मीन ख़रीद कर अपना छोटा क्लीनिक खोल लिया।एक 12कड़ियों का कमरा औऱ सामने छप्पर डालकर बैठना शुरू कर दिया।यही दिन जीवन का टर्निंग डे बन गया।फ़िर क़भी पीछे मुड़कर नहीँ देखा।एक सफ़ल चिकित्सक के साथ-साथ सफ़ल किसान के रूप में भी अग्रसर रहे।धीरे-धीरे औऱ ज़मीनें ख़रीदीं, चिकित्सा के साथ खेती करना छोटी घर में गऊ शाला जिनका कार्य एक नोकर के सहयोग से ख़ुद करना औऱ भोर के समय अपनी शेरो-शायरी के शौक को निरंतर ज़ारी रखा। उर्दू की अच्छी जानकारी के कारण आज उर्दू के शायरों के बीच में अच्छा मुक़ाम हासिल किया है।आपके द्वारा लिखीं क़िताबों की सूची भी काफ़ी लम्बी है। सन1950 से लिखीं किताबें क्रमशा "डकैत"औऱ "तलवार"नाविल के रूप में सन 1951 में लिखी क़िताब "कुँआरी माँ"नाविल के रूप में,सन1953 में लिखी"शिवाजी"हिंदी खंड काव्य के रूप में,सन1956 में लिखी"महाभारत"काव्य के रूप में,सन1957 में लिखी"अभागा"काव्य के रूप में,सन1958 में लिखी"बेगाना"नाविल के रूप में,सन1959 में लिखी"हक़ परस्ती"नाविल के रूप में,सन1962 में लिखी"अंजाम"नाविल के रूप में,सन1963 में लिखी"ठोकर"हिंदी बाल काव्य के रूप मे,"सत्कार"औऱ सन1964 में लिखी"ज़माना"नाविल के रूप में,सन1971 में लिखी"करमेती का इतिहास"काव्य ग्रन्थ के रूप में,सन1972 में लिखी"जलता देश झुलसती धरती"नाविल के रूप में,सन1982 में लिखी"मुक्तक",सन1983 में लिखी"लाज़बाब"कहानी के रूप में,सन1984 में लिखी"लीख से हटकर"कहानी के रूप में,सन1984 में ही लिखी"उघड़ी काया"कहानी के रूप में,सन1986 में लिखी"इशारा"हिंदी में,सन1998 में लिखी"सनलिकत शेर"सन1998 में ही लिखी"उजले-दामन"कहानी सँग्रह के रूप में,सन1994 में लिखी"प्रीतांजली"काव्य गीत के रूप में,सन1998में लिखी"नाव भवँर की ओर"हिंदी निबन्ध के रूप में,सन1998 में ही लिखी"ज़र्रा-ज़र्रा सूरज"उर्दू कहानी के रूप में लिखीं।इनके अलावा तीन भाषाओं में छपी "किरणों के पद चिन्ह" "मुसलमान का मंदिर"व"आशीर्वाद"चर्चित अन्य किताबें हैं।। उर्दू में लिखीं अन्य किताबें,"राजो-नियाज़"सन1974 में,"साज़ो-आवाज़"सन1975 में लिखीं।सन1973 में लिखी"अरमाने-दिल"मुक्तक के रूप में,सन1979में लिखी"आईने"मुक्तक के रूप में,सन1982में लिखी"मानसरोवर"हिंदी उर्दू इंग्लिश में छपी,सन1984 में लिखी"हर बार कहा दिल ने"कहानी सँग्रह के रूप में उर्दू भाषा मे छपी,सन1997 में छपी"धूप के टुकड़े"कहानी के रूप में उर्दू में छपी। आपकी एक कहानी अगस्त सन 1983 में B.B.C. लंदन पर रिकॉर्ड की गई।कहानी का नाम"लाज़बाब"है।आपने सन1983 में लंदन कवि सम्मेलन में"सदारद"की।अपने सन1984 में लखनऊ में गैर मुस्लिम उर्दू राइटर्स कॉन्फ्रेंस में भी शिरकत की।आपकी कहानियाँ औऱ काव्य 28 फरवरी सन 1981 में आकाशवाणी रामपुर से भी पड़ी गईं।आपकी दो किताबों"मानसरोवर"औऱ"हर बार कहा दिल ने"को उत्तरप्रदेश उर्दू अकाडमी औऱ बिहार उर्दू अकाडमी से पुरुस्कृत कर सम्मानित किया गया है।हाल ही में आपको "धूप के टुकड़े"औऱ चालीस वर्षों से उर्दू साहित्य में अपना योगदान देने के उपलक्ष्य इंटरनेशनल लेबिल का 9 मार्च 1999 को भारत के सर्वश्रेष्ठ उर्दू के कहानीकार के रूप में मोहम्मद रिसालुद्दीन साहिब "लंदन" के पुण्य हाथों से दिल्ली ग़ालिब एडोटोरियम माता सुंदरी लेन में आयोजित एक भव्य समारोह में मुंशी प्रेम चंद एवार्ड से सम्मानित किया गया।आपको लाइफ़टाइम एचीममेन्ट एवार्ड एवं 5100 रुपये की नक़द राशी देकर मुरादाबाद में माननीय एम पी साहब हाफ़िज़ मोहम्मद सिद्दीक़ी के हाथों सम्मानित किया गया। मुरादाबाद जिले की तहसील बिलारी का का नाम रौशन करने के लिये आपने अपनी लेखनी द्वारा जो कार्य किया औऱ उम्र भर सफ़ल चिकित्सक के रूप में समाज की सेवा की ,वो वाकई सरहानीय कार्य है।वर्ष 2015 में ब्रह्मलीम के बाद भी उनकी सेवाओँ को याद किया जाता है।स्टेशन रोड पर उनके नाम से उदय नगर कालोनी का निर्माण वर्ष 2010-11 में हुआ।जो आज विशाल रूप ले चुकी है।आप सदैव सभी परिवार के सदस्यों एवम पूरे छेत्र वासियों के दिल में अपनी जगह बनाए हुए हैं।डॉक्टर उदय सरन 'अरमान ' के सम्पूर्ण कार्यकाल को संछिप्त में लाने का एक प्रयास किया गया है।आने वाली पीड़ी के लिये वे सदैव प्रेणना स्रोत रहेंगे। लेख़क -------------- अरिनास शर्मा ,बिलारी।। ---------------------------------------- ------------------------------------------
Saturday, November 8, 2025
इंसाफ़
इंसाफ़ है ये कैसा मेरे लिये कि ख़ुशी मिले तो छड़-भर मिले औऱ दर्द मिले तो ऐसा औऱ इतना कि दर्द से भी दर्द करहा उठे हँसी भी आई होठों पर बस पल-भर के लिये ही औऱ गिरे तो आँख भर-भर गिरे न जानें समय ने कैसा है ये खेल खेला कि हाथ ख़ाली औऱ दूर कहीँ आसमाँ ज़मी से जा मिले ये खेल तो नहीँ दो खिलाड़ी का नज़र में जीते तू ही औऱ हार बस मुझे ही क्यूँ मिले मेरी ज़िंदगी कोई पल की तो नहीँ तो ज़मी मुझे बस ज़रा सी ही मिले ये कोई फ़ैसला सुकूं से भरा भी नहीँ साँस भी लिये तो गिन-गिन कर लिये है चंद दिनों का ही तो खेला फ़िर तो मैंदान में भी खिलाड़ी ज़मी पर ही गिरे क्यों आनन्द इतना तुझको आता है मुझ पर कि मेरी आँख तुझको नम ही अच्छी लगे हैं बहुत शिकायतें मेरी ज़िंदगी को तुझसे तू कहाँ है बस तेरी एक झलक तो मिले मुझे रोना बहुत है तेरी गोद मे सर रख कर तेरा हाथ मेरे सर पर तो लगे मैं उलझा रहा यूँ ही व्यर्थ की ही उलझनों में एक रस्ता ज़मी पर मुझे भी तो मिले मैं भटका नहीँ उलझ गया हूँ ख़ुद-ही में मुझे भी तो मेरी ज़िंदगी की ख़बर तो मिले मैं ज़िन्दा हूं या नहीँ भी हूँ अब फ़र्क किसे पड़ता है जब खुले आसमाँ की हवा ही न मिले-मिले तो बस दर्द के पुलनदे ढो-ढो कर मेरे अब कंधे भी थके मुझे मेरी मंज़िल का किनारा भी नज़र आता नहीँ है नज़र आ जाये तो बैठ जाऊँ अब तो शरीर भी ज़बाब दे चले कि इससे पहले बिखर जाऊँ टूट जाऊँ रेत के घर की तरह बस एक बार तू आँख में मेरी ख़ुशी की रौशनी भर दे। अरिनास शर्मा। ---------------------- -----------------------
Sunday, October 26, 2025
परदा
हँसी है तो आँसू हैं आँसू हैं तो दर्द है दर्द है तो ज़ख़्म है ज़ख़्म है तो मूरत है मूरत है षड़यंत्र हैं षड़यंत्र हैं तो परदा है परदा है तो अंत है। हर आदमी का जीवन अनादिकाल से षड्यंत्रों का शिकार होता आया है,चाहे वो षड्यंत्रकारी परिवार से हो रिश्तेदारी से हो दोस्ती से हो अधिकारी से हो जीवन तो बस वो उलझा हुआ रहस्यमयी कुआँ है कि जिसमें जितना भी झाँक लो सिवाए अंधकार के कुछ भी नज़र नहीँ आता है।आदमी का चरित्र कितना गिरता जा रहा है वो किस दिशा में जा रहा है कुछ समझ में नहीँ आता है। उपदेश देने वाले ख़ुद चरित्र से गिर चुके हैं, अध्यापक ख़ुद छात्र बने घूम रहे हैं,अध्यापक औऱ छात्र का चरित्र एक समान नज़र आता है,जीवन बचाने वाला चिकित्सक व्यापारी बन बैठा है,पुलिस अपराधी औऱ पत्रकार ब्लेकमेकर बन चुके हैं, समझ में नहीँ आता है कि कौन अभिनय कर रहा है औऱ कौन ईमानदारी से जीवन जी रहा है।मिठास सभी के अंदर इतनी भर चुकी है सभी कड़वा ही बोल रहे हैं।न क़िसी की नज़र ही सीधी है न क़िसी की ज़ुबान ही मीठी है। अजीब हालात हो गये हैं,ख़ुद को दर्पण में देख़ो तो ख़ुद का चेहरा ही झूठा सा लगता है,समझ नहीँ आता है कि जब मैं खड़ा हूँ तो दर्पण किसको दिखा रहा है।परछाईं हो या वास्तविकता जब झूठ ही नज़र आती है,अगर ये हमारा आज है तो बच्चों का कल कितना भयानक होगा।आज हम इतने दर्द को महसूस कर रहे हैं तो हमारे बच्चों के कल की खुशियाँ कहाँ से मिलेंगीं। आज के दौर में कुछ भी तो सही नहीँ है।जीवन पूरी तरह से उथल-पुथल हो चुका है।जीते जी ज़िन्दा सुखी नहीँ है औऱ बाद मरने के ज़िन्दगी नहीँ है,जाएं तो जाएं कहाँ,जियें तो जियें कैसे?अजीब कशमकश में जिंदगी ने आदमी को ला खड़ा किया है या आदमी ख़ुद ही जिम्मेदार है कुछ समझ में नहीँ आ रहा है।दोष देने वाला दोषी है या भोगने वाला दोषी है,उँगली किसकी तरफ़ उठाये,ये भी मुश्किल है। अब दिन प्रतिदिन विचारों में गिरावट आती जा रही है,व्यवहार अपराधी हो चुके हैं,जीवनदाता शत्रु बन चुके हैं,लोभ-लालच ने सभी अच्छाइयों को नष्ट कर दिया है,मानव ज़िन्दा हैं मानवता मर चुकी है,लगता है जीवन एक अंतिम अधध्याय चल रहा है।पुस्तक के अंतिम पृष्ठ की तरह जीवनरेखा भी अंतिम चरण में प्रवेश कर चुकी है।महादेव जाने आने वाला कल कैसा होगा,आज तो बस छल की ही चल रही है। अरिनास शर्मा ^^^^^^^^^^^^^^ ^^^^^^^^^^^^^^
Wednesday, October 15, 2025
युयुत्सु
युयुत्सु धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों में एकमात्र जीवित बचा था,क्योंकि धर्म के रास्ते पर चलते हुए उसने युद्ध में दुर्योधन का साथ न देकर युधिष्ठिर का साथ दिया था।कुरुक्षेत्र में युयुत्सु ने अनेकों कौरवों को मौत के घाट उतार दिया था।धृतराष्ट्र युयुत्सु से बेहद नफ़रत करता था,क्योंकि एक तो वो सौतेला भाई था औऱ धृतराष्ट्र की नाजायज़ औलाद भी था। धृतराष्ट्र के एक सेविका से अवैध सम्बन्धों का परिणाम युयुत्सु था,इसलिए भी अन्य कौरव भाई उसे अच्छी निगाह से नहीँ देखते थे।युयुत्सु भी दुर्योधन के विचारों से सहमत नहीँ था,क्योंकि वो हमेशा पांडवों भाइयों को नीचा दिखाने में लगा रहता था।दोनों के विचारों में ज़मीन-आसमान का अंतर था। कुरुक्षेत्र में युद्ध के अंतिम दिन तक सभी कौरवों की म्रत्यु हो चुकी थी।युद्ध छेत्र मानव शवों से पट गया था।हर तरफ़ सामुहिक चिताएं बनाकर दाहसंस्कार किया जा रहा था।युयुत्सु युद्ध के परिणाम के साथ महल में प्रवेश कर चुका था,परन्तु कोई भी उसके जीवित लौटने से इतना ख़ुश नहीँ था जितना दुःख अन्य की म्रत्यु का मनाया जा रहा था।परिवार की अनेक महिलाएँ तो उसे यहाँ-तक ताने मार रहीं थीं कि तू बचकर क्यों आ गया उनके साथ मर क्यों नहीँ गया। धृतराष्ट्र के म्रत्यु उपरांत पुत्र का कर्तव्य निभाते हुए युयुत्सु ने ही चिता को अग्नि दी थी।कई वर्षों तक राज करते हुए परिवार की महिलाएँ उसे जीवित रहने के औऱ युधिष्ठिर से मिलने के भीषण ताने मारते हुए उसका जीवन इतना कष्टमय बना दिया था कि एक दिन काफ़ी विचार के बाद युयुत्सु ने अपने जीवन का सबसे कठोर फ़ैसला लेते हुए आत्महत्या का निर्णय ले डाला। पृथ्वी पर उठाए क़िसी मानव द्वारा ये पहला जघन्य अपराध था।इससे पहले न क़भी क़िसी ने आत्महत्या की थी औऱ न ही ऐसा विचार क़िसी के मन में आया था।तलवारों की धार औऱ तीरों के हमलों को मात देने वाला वीर योद्धा युयुत्सु व्यंग भरे शब्दों के हमलों को सह न सका औऱ आत्महत्या कर बैठा।परन्तु उसके भाग्य में म्रत्यु के बाद भी सुख नहीँ था। प्रभु को भी युयुत्सु का ये फ़ैसला घोर अपराध लगा औऱ युयुत्सु को पृथ्वी के अंत समय तक भटकने का श्राप दे दिया।प्रभु अनुसार युयुत्सु ने निराशावान मानवों को आत्महत्या का एक ऐसा रास्ता दिखा दिया था कि अब घोर निराशा में डूबा हर मानव आत्महत्या को ही सरल समझकर ऐसा करने लगेगा।इस अपराध के लिए कोई छमा नहीँ है।तभी से समाज मे इस अपराध का भी चलन शुरू हो गया।जो घोर निंदनीय है।। आज भी हमारे समाज में आत्महत्या को अच्छा नहीँ मानते हैं, फ़िर भी आत्महत्या करने वालों की सँख्या में इजाफ़ा होता जा रहा है।निराशा से बचने का एकमात्र उपाय आत्महत्या नहीँ बल्कि जीवनसंघर्ष है।जीवन जीने के नए रास्ते खोज़ो,स्थान बदलो,उन रिश्तों से सम्बन्डविच्छेद करो जो घोर निराशा में धकेलने को मजबूर करते हैं।जीवन पुभु का दिया वो अनमोल उपहार है जो हर क़िसी के भाग्य में नहीँ होता है।जीवन जियो औऱ ऐसे सार्थक करो। प्रभु ही सत्य हैं।बाक़ी सब व्यर्थ है।। अरिनास शर्मा ------------------------- युयुत्सु की माँ का नाम आर्या था,वो वैश्य जाती की थीं। सौ कौरव पुत्र एवं एक पुत्री में 102 वें स्थान में सौतेले भाई युयुत्सु थे। --------------------------
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