Wednesday, October 15, 2025

युयुत्सु

युयुत्सु धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों में एकमात्र जीवित बचा था,क्योंकि धर्म के रास्ते पर चलते हुए उसने युद्ध में दुर्योधन का साथ न देकर युधिष्ठिर का साथ दिया था।कुरुक्षेत्र में युयुत्सु ने अनेकों कौरवों को मौत के घाट उतार दिया था।धृतराष्ट्र युयुत्सु से बेहद नफ़रत करता था,क्योंकि एक तो वो सौतेला भाई था औऱ धृतराष्ट्र की नाजायज़ औलाद भी था।             धृतराष्ट्र के एक सेविका से अवैध सम्बन्धों का परिणाम युयुत्सु था,इसलिए भी अन्य कौरव भाई उसे अच्छी निगाह से नहीँ देखते थे।युयुत्सु भी दुर्योधन के विचारों से सहमत नहीँ था,क्योंकि वो हमेशा पांडवों भाइयों को नीचा दिखाने में लगा रहता था।दोनों के विचारों में ज़मीन-आसमान का अंतर था।                                                                   कुरुक्षेत्र में युद्ध के अंतिम दिन तक सभी कौरवों की म्रत्यु हो चुकी थी।युद्ध छेत्र मानव शवों से पट गया था।हर तरफ़ सामुहिक चिताएं बनाकर दाहसंस्कार किया जा रहा था।युयुत्सु युद्ध के परिणाम के साथ महल में प्रवेश कर चुका था,परन्तु कोई भी उसके जीवित लौटने से इतना ख़ुश नहीँ था जितना दुःख अन्य की म्रत्यु का मनाया जा रहा था।परिवार की अनेक महिलाएँ तो उसे यहाँ-तक ताने मार रहीं थीं कि तू बचकर क्यों आ गया उनके साथ मर क्यों नहीँ गया।                                                                                                                      धृतराष्ट्र के म्रत्यु उपरांत पुत्र का कर्तव्य निभाते हुए युयुत्सु ने ही चिता को अग्नि दी थी।कई वर्षों तक राज करते हुए परिवार की महिलाएँ उसे जीवित रहने के औऱ युधिष्ठिर से मिलने के भीषण ताने मारते हुए उसका जीवन इतना कष्टमय बना दिया था कि एक दिन काफ़ी विचार के बाद युयुत्सु ने अपने जीवन का सबसे कठोर फ़ैसला लेते हुए आत्महत्या का निर्णय ले डाला।                       पृथ्वी पर उठाए क़िसी मानव द्वारा ये पहला जघन्य अपराध था।इससे पहले न क़भी क़िसी ने आत्महत्या की थी औऱ न ही ऐसा विचार क़िसी के मन में आया था।तलवारों की धार औऱ तीरों के हमलों को मात देने वाला वीर योद्धा युयुत्सु व्यंग भरे शब्दों के हमलों को सह न सका औऱ आत्महत्या कर बैठा।परन्तु उसके भाग्य में म्रत्यु के बाद भी सुख नहीँ था।                                                                                                   प्रभु को भी युयुत्सु का ये फ़ैसला घोर अपराध लगा औऱ युयुत्सु को पृथ्वी के अंत समय तक भटकने का श्राप दे दिया।प्रभु अनुसार युयुत्सु ने निराशावान मानवों को आत्महत्या का एक ऐसा रास्ता दिखा दिया था कि अब घोर निराशा में डूबा हर मानव आत्महत्या को ही सरल समझकर ऐसा करने लगेगा।इस अपराध के लिए कोई छमा नहीँ है।तभी से समाज मे इस अपराध का भी चलन शुरू हो गया।जो घोर निंदनीय है।।                                                              आज भी हमारे समाज में आत्महत्या को अच्छा नहीँ मानते हैं, फ़िर भी आत्महत्या करने वालों की सँख्या में इजाफ़ा होता जा रहा है।निराशा से बचने का एकमात्र उपाय आत्महत्या नहीँ बल्कि जीवनसंघर्ष है।जीवन जीने के नए रास्ते खोज़ो,स्थान बदलो,उन रिश्तों से सम्बन्डविच्छेद करो जो घोर निराशा में धकेलने को मजबूर करते हैं।जीवन पुभु का दिया वो अनमोल उपहार है जो हर क़िसी के भाग्य में नहीँ होता है।जीवन जियो औऱ ऐसे सार्थक करो।                                         प्रभु ही सत्य हैं।बाक़ी सब व्यर्थ है।।                                                                                अरिनास शर्मा                                                                      -------------------------                           युयुत्सु की माँ का नाम आर्या था,वो वैश्य जाती की थीं।                  सौ कौरव पुत्र एवं एक पुत्री में 102 वें स्थान में सौतेले भाई युयुत्सु थे।                                     --------------------------

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