Sunday, October 26, 2025

परदा

हँसी है तो आँसू हैं आँसू हैं तो दर्द है दर्द है तो ज़ख़्म है ज़ख़्म है तो मूरत है मूरत है षड़यंत्र हैं षड़यंत्र हैं तो परदा है परदा है तो अंत है।              हर आदमी का जीवन अनादिकाल से षड्यंत्रों का शिकार होता आया है,चाहे वो षड्यंत्रकारी परिवार से हो रिश्तेदारी से हो दोस्ती से हो अधिकारी से हो जीवन तो बस वो उलझा हुआ रहस्यमयी कुआँ है कि जिसमें जितना भी झाँक लो सिवाए अंधकार के कुछ भी नज़र नहीँ आता है।आदमी का चरित्र कितना गिरता जा रहा है वो किस दिशा में जा रहा है कुछ समझ में नहीँ आता है।                                                     उपदेश देने वाले ख़ुद चरित्र से गिर चुके हैं, अध्यापक ख़ुद छात्र बने घूम रहे हैं,अध्यापक औऱ छात्र का चरित्र एक समान नज़र आता है,जीवन बचाने वाला चिकित्सक व्यापारी बन बैठा है,पुलिस अपराधी औऱ पत्रकार ब्लेकमेकर बन चुके हैं, समझ में नहीँ आता है कि कौन अभिनय कर रहा है औऱ कौन ईमानदारी से जीवन जी रहा है।मिठास सभी के अंदर इतनी भर चुकी है सभी कड़वा ही बोल रहे हैं।न क़िसी की नज़र ही सीधी है न क़िसी की ज़ुबान ही मीठी है।                                                                                                                         अजीब हालात हो गये हैं,ख़ुद को दर्पण में देख़ो तो ख़ुद का चेहरा ही झूठा सा लगता है,समझ नहीँ आता है कि जब मैं खड़ा हूँ तो दर्पण किसको दिखा रहा है।परछाईं हो या वास्तविकता जब झूठ ही नज़र आती है,अगर ये हमारा आज है तो बच्चों का कल कितना भयानक होगा।आज हम इतने दर्द को महसूस कर रहे हैं तो हमारे बच्चों के कल की खुशियाँ कहाँ से मिलेंगीं।                       आज के दौर में कुछ भी तो सही नहीँ है।जीवन पूरी तरह से उथल-पुथल हो चुका है।जीते जी ज़िन्दा सुखी नहीँ है औऱ बाद मरने के ज़िन्दगी नहीँ है,जाएं तो जाएं कहाँ,जियें तो जियें कैसे?अजीब कशमकश में जिंदगी ने आदमी को ला खड़ा किया है या आदमी ख़ुद ही जिम्मेदार है कुछ समझ में नहीँ आ रहा है।दोष देने वाला दोषी है या भोगने वाला दोषी है,उँगली किसकी तरफ़ उठाये,ये भी मुश्किल है।             अब दिन प्रतिदिन विचारों में गिरावट आती जा रही है,व्यवहार अपराधी हो चुके हैं,जीवनदाता शत्रु बन चुके हैं,लोभ-लालच ने सभी अच्छाइयों को नष्ट कर दिया है,मानव ज़िन्दा हैं मानवता मर चुकी है,लगता है जीवन एक अंतिम अधध्याय चल रहा है।पुस्तक के अंतिम पृष्ठ की तरह जीवनरेखा भी अंतिम चरण में प्रवेश कर चुकी है।महादेव जाने आने वाला कल कैसा होगा,आज तो बस छल की ही चल रही है।                                                                                                   अरिनास शर्मा                                                                       ^^^^^^^^^^^^^^                                                                     ^^^^^^^^^^^^^^

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