Sunday, October 5, 2025
मैं
मैं वो क़िताब हूँ जिसको पड़ने की ज़रूरत नहीँ है क्योंकि कुछ किताबें लिखीं तो काली सिहाई से ही हैं परंतु उसमें लिखे शब्दों को समझना,उनकी समीक्षा करना बहुत ही कठिन हो जाता है,पड़ने वाला हर शब्द का अर्थ अपने जीवनकाल के कर्मों से जोड़ कर देखने लगता है और यहीं से एक ऐसा द्वंद छिड़ जाता से जो अच्छे-ख़ासे विषय को ग़लत दिशा मे ले जाकर लेख़क के विचारों को दुर्भाग्यपूर्ण दिशा मे ला खड़ा करता है,इसलिए जिसे भी आप पड़ना चाहते हैं उसको सबसे पहले जड़ से समझना बहुत ज़रूरी है।मैं कोई मनोरंजन नहीँ बल्कि एक ऐसा इतिहास हूँ जो गुज़र भी गया और जो ज़िन्दा भी है,मेरे जीवन के कड़वे घूटों से एक मयख़ाना खुल सकता है,मेरे अनुभव ख़ुशी कम देंगे आँसू से झोली भर देंगे।मुझे पड़ने के लिए दिमाग़ की नहीँ दिल की ज़रूरत पड़ेगी,मैं वो शायर नहीँ जिसकी हर बात पर वाह-वाह निकले बल्कि हर शब्द पर आह ज़रूर निकलेगी।वो समय दोषी है जिसने मुझे ऐसा बना दिया या मैं स्वम दोषी हूँ जो वक़्त के साथ चल न सका,अगर क़सूर मेरा है तो क़सूरवार वक़्त भी कम नहीँ है,जो भी शब्द मेरे पास मुझे माँ सरस्वती जी से मिले हैं उन्हीं शब्दों को पिरो कर अपनी बात खुलकर रख देता हूँ, अब या तो मेरा तरीक़ा ग़लत है या मुझे ही अभी तक शब्दों को सजाना नहीँ आया है,शायद मैं ही दोषी हूँ, परन्तु अभी मेरे जीवन के ठेर सारे पन्ने बाक़ी हैं जिन पर वक़्त की क़लम को अभी चलना बाक़ी है,जिस दिन ये जीवन की क़िताब पूर्ण हो जाएगी उस दिन वक़्त निकाल कर मुझे पड़ना ज़रूर, हाँ मैं तो नहीँ रहूँगा मग़र तुम्हारे विचारों को जानने की अभिलाषा ज़रूर रहेगी,एक दिन।। लेखक------अरिनास शर्मा। ------------------------------------ -------------------------------------
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