Monday, December 16, 2024

आज का दौर

आज की सबसे बड़ी विडंबना ये है कि आज यूट्यूब औऱ गूगल के दौर में हर आदमी बिना स्कूल जाए इतना बुद्धिमान हो गया है कि वो आप की बात बीच मे ही काट के अपना ज्ञान परोसने में लग जाता है औऱ उसका पहला उद्देश्य आपको मूर्ख औऱ खुद को होशियार साबित करना होता है।अब समस्या तब पैदा जोती है जब ज़रूरत से ज्यादा बने आदमी का सामना असल जिंदगी में असल मुसीबत से होता है तो उसका मोबाइल ज्ञान धरा का धरा रह जाता है।                                                   आप की उम्र आपका अनुभव वो प्राप्त करने योग्य ही नहीँ हैं जो पूर्ण रूप से मोबाइल ज्ञान के शिकारी हो चुके हैं।यदि वो क़िसी कारण से आपकी बात सुन भी लेते हैं तो भी अंत में निर्णय उन्हीं का होता है,क्योंकि उनसे ज्यादा ज्ञान क़िसी को हो ही नहीँ सकता है।उन्हें ये भी बर्दाशत नहीँ होता है कि उनके सामने आपको कोई होशियार बता दें औऱ उनकी बात का वज़न कम हो जाये,तो बता दूं कि ऐसे आदमियों से सावधान रहें औऱ दूरी बनाए रखें जो अपना जीवन अपनी यात्रायें यूट्यूब औऱ गूगल के शेयर व्यतीत कर रहे हैं।          ये महान पुरुष क़भी क़िसी की न तो सुनते हैं न ही क़िसी को सम्मान देना पसन्द करते हैं,ये वो लोग हैं जो बीच सड़क पर अपने बाप की बेज्जती करने से भी परहेज़ नहीँ करते हैं।अब अपना मान-सम्मान बचाये ऱखने के लिए ऐसे लोगों को चिंहित करें औऱ ख़ामोशी से अपना जीवनयापन करें।हँसते रहें मस्त रहें।                                     अरिनास शर्मा।

Sunday, December 15, 2024

तपस्या

कई वर्ष पुरानी बात है,एक गाँव में एक परिवार में बाल विवाह हुआ,रीति रिवाज़ों के अनुसार बधू वर के घर पांच दिन रही औऱ छटे दिन वो अपने पिता के घर वापिस आ गई।                                                                 रिवाजों के अनुसार जब दोनों बालिग़ हो जाएंगे तो पति अपनी पत्नी को पिता के घर से विदा करा कर ले आता है।अब समय गुजरा दोनों बच्चे बड़े हो गये।एक दिन पड़ोस में एक मेला लगा हुआ था,दोनों परिवार मेले में आये हुए थे।लड़की को अकेला घूमता देख अचानक लड़के ने देख़ा तो पहचान गया परन्तु लड़की ने नहीँ पहचाना।                                                                                                  जब लड़के ने लड़की को रोक कर हालचाल पूछे तो लड़की ने ग़ुस्से में कहा,जान न पहचान तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे रोकने की।लड़के ने हसँ कर कहा,अरे तुम मुझे भूल गईं, चार दिन मेरे घर मेरे साथ रही हो और अब पहचान भी नहीँ रही हो।लड़की को साथ सोने की बात सुनकर ग़ुस्से में लड़के के गाल पर चपत मार दिया।लड़का गुस्से में वहाँ से चला गया।                                                        जब लड़की के घर वालों को पता चला तो उन्होंने लड़की को समझाया।लड़की बोली मेरी कोई ग़लती नहीँ थी कम से कम मुझे बताना चाहिए था मैं पहचान ही नहीँ पाई थी।अब समय आया बिदाई का तो लड़के ने साफ़ मना कर दिया।बोला,जिसनें मेले में मेरे चपत मार दिया उसे बुलाने का मतलब ही नहीँ है।जब घर वालों ने बहुत समझाया तो उसने ये शर्त रख दी कि यदि वो माफ़ी मांग ले तो में बुला लाऊंगा।जब ये ख़बर लड़की वालों के यहाँ पहुँची तो लड़की ने माफ़ी मांगने से तो मना कर दिया परन्तु ये बता दिया कि यदि वो बुलाने का जाए तो में चली जाऊँगी।                                                                                                बस लड़की ने माफ़ी नहीँ माँगी औऱ लड़का क़भी बुलाने नहीँ गया।समय गुज़रता गया दोनोँ की उम्र गुज़रती गई,पिता ने समझ लिया की बेटी ज़िद्दी है अब नहीँ जाएगी तो बेटी के नाम दस बीघा ज़मीन कर दी।ताकि आगे चल कर उसे क़िसी के आगे हाथ न फैलाने की ज़रूरत न पड़े।समय औऱ गुजरा बेटी के माता-पिता का भी देहांत हो गया।बेटी एक स्कूल में टीचर बन गई थी।        दोनोँ ने अलग शादी भी नहीँ की थी।एक दिन सुसराल से ख़बर आई कि पति की तबियत बहुत ख़राब है अब वो उम्र के अंतिम पड़ाव पर है,एक बार आकर मिल लो।लड़की ने सोचा पूरे जीवन तो मुझे बुलाने नहीँ आया अब जाने से क्या फ़ायदा।मग़र मानवता के नाते वो एक बार मिलने ससुराल गई औऱ पति से मिली।पति नेपूछा,आ गईं चलो मैंने तुम्हें माफ़ किया,सब भूल जाना।पति ने अंतिम सांस ली।                                   पति के ज़ायदाद के कागज़ घर वालों ने पत्नी के हाथ मे रख दिये।पत्नी ने कहा जब जीते जी ये मुझे लेकर नहीँ आये तो में इस दौलत का क्या करूँगी।उसने सारी दौलत उनके भाईयों के नाम कर दी औऱ वापस अपने घर आ गई।उसने कमरा अंदर से बंद कर लिया औऱ उसने भी अपनी अंतिम सांस लेकर अपना सफ़र पूरा किया।                                                              यह कहानी पात्र जगह सभी काल्पनिक हैं।                                                                                              अरिनास शर्मा।

त्याग

देवपुर गाँव मे एक छोटा परिवार रहता था,माँ-बाप और चौदह साल का बेटा,खेती करके अपना पालन-पोषण कर रहे थे।सब कुछ ठीक चल रहा था कि एक दिन दुःखद घटना घट गई।अचानक पत्नी के पेट मे दर्द उठा इससे पहले कुछ समझ आता पत्नी का देहांत हो गया।                    पिता और चौदह साल का बेटा,रो-रो कर बुरा हाल हो गया।गाँव के लोगोँ ने समझाया कि बेटा अभी बहुत छोटा है दूसरा विवाह कर लो।पिता ने बिना विवाह किए बेटे को पालने का निर्णय किया।बेटा जब उन्नीस साल का हुआ तो पिता ने बेटे का विवाह कर दिया।परिवार में फ़िर खुशियाँ आ गईं।मग़र विधाता को तो कुछ और ही मंजूर था।एक वर्ष में बेटे का भी देहांत हो गया।परिवार पर एक बार फ़िर दुःखों का पहाड़ टूट गया।अब पिता औऱ बेटे की विधवा पत्नी रह गए थे।                                                                                   एक दिन पिता ने अपनी विधवा बहु को समझाया कि बेटी अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है अगर तुम कहो तो में अच्छा सा लड़का देखकर तुम्हारा विवाह कर देता हूँ, तुम्हारा जीवन आराम से व्यतीत हो जायेगा।।परन्तु बहु ने विवाह करने को औऱ घर छोड़ने को साफ़ मना कर दिया।बहु ने पिता को समझाया कि,पिताजी में तो अब उनकी यादों के साथ आपके पास ही रहूँगी,परन्तु आप अपना दूसरा विवाह कर लीजिये वरना समाज हम पर ताने मार-मार कर जीने नहीँ देगा।।पुत्र बहु के दबाव में आ कर न चाहते हुए भी पचपन वर्षीय पिता को विवाह करना पड़ा।।                                                                  अब पुत्र बहु ने अपनी सास का अभिनन्दन किया औऱ सास-ससुर की सेवा में लग गई।मग़र पिता ने अपनी पत्नी से भी अपनी पुत्र बहु को पूरा सम्मान दिलवाया।समय बीता अब ससुर के दो बेटे हुए, बेटे बड़े हुए, पुत्र बहु ने अपने सामने ज़मीन का बंटवारा कराया।आधी-आधी ज़मीन दिनों बेटों के नाम कराई।अंत में उम्र की दहलीज़ पर पहुँचकर पहले ससुर चल बसे औऱ कुछ समय बाद पुत्र बहु भी चल बसी।        आज दोनोँ बेटे अपने परिवार के साथ ख़ुशी-ख़ुशी जीवन बिता रहे हैं, औऱ पुत्र बधू के त्याग के चर्चे आज भी आस-पास गाँव मे होते हैं।यही कहानी का अंत है।कहानी के पात्र व घटनाएं काल्पनिक हैं।                                                            अरिनास शर्मा।