Sunday, December 15, 2024

त्याग

देवपुर गाँव मे एक छोटा परिवार रहता था,माँ-बाप और चौदह साल का बेटा,खेती करके अपना पालन-पोषण कर रहे थे।सब कुछ ठीक चल रहा था कि एक दिन दुःखद घटना घट गई।अचानक पत्नी के पेट मे दर्द उठा इससे पहले कुछ समझ आता पत्नी का देहांत हो गया।                    पिता और चौदह साल का बेटा,रो-रो कर बुरा हाल हो गया।गाँव के लोगोँ ने समझाया कि बेटा अभी बहुत छोटा है दूसरा विवाह कर लो।पिता ने बिना विवाह किए बेटे को पालने का निर्णय किया।बेटा जब उन्नीस साल का हुआ तो पिता ने बेटे का विवाह कर दिया।परिवार में फ़िर खुशियाँ आ गईं।मग़र विधाता को तो कुछ और ही मंजूर था।एक वर्ष में बेटे का भी देहांत हो गया।परिवार पर एक बार फ़िर दुःखों का पहाड़ टूट गया।अब पिता औऱ बेटे की विधवा पत्नी रह गए थे।                                                                                   एक दिन पिता ने अपनी विधवा बहु को समझाया कि बेटी अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है अगर तुम कहो तो में अच्छा सा लड़का देखकर तुम्हारा विवाह कर देता हूँ, तुम्हारा जीवन आराम से व्यतीत हो जायेगा।।परन्तु बहु ने विवाह करने को औऱ घर छोड़ने को साफ़ मना कर दिया।बहु ने पिता को समझाया कि,पिताजी में तो अब उनकी यादों के साथ आपके पास ही रहूँगी,परन्तु आप अपना दूसरा विवाह कर लीजिये वरना समाज हम पर ताने मार-मार कर जीने नहीँ देगा।।पुत्र बहु के दबाव में आ कर न चाहते हुए भी पचपन वर्षीय पिता को विवाह करना पड़ा।।                                                                  अब पुत्र बहु ने अपनी सास का अभिनन्दन किया औऱ सास-ससुर की सेवा में लग गई।मग़र पिता ने अपनी पत्नी से भी अपनी पुत्र बहु को पूरा सम्मान दिलवाया।समय बीता अब ससुर के दो बेटे हुए, बेटे बड़े हुए, पुत्र बहु ने अपने सामने ज़मीन का बंटवारा कराया।आधी-आधी ज़मीन दिनों बेटों के नाम कराई।अंत में उम्र की दहलीज़ पर पहुँचकर पहले ससुर चल बसे औऱ कुछ समय बाद पुत्र बहु भी चल बसी।        आज दोनोँ बेटे अपने परिवार के साथ ख़ुशी-ख़ुशी जीवन बिता रहे हैं, औऱ पुत्र बधू के त्याग के चर्चे आज भी आस-पास गाँव मे होते हैं।यही कहानी का अंत है।कहानी के पात्र व घटनाएं काल्पनिक हैं।                                                            अरिनास शर्मा।

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