Wednesday, July 16, 2025
पटकथा
एक नया दिन औऱ फ़िर वही पुराना क्लेश एक गरीब परिवार की शुरूबात,पिता महेश चंद,"कर्ज़ा करके तुझे पड़ाया औऱ तू आवाराओं की तरह घूमता-फिरता है कोई नोकरी क्यों नहीँ करता है?कब-तक हम पर बोझ बना रहेगा?"माँ,"बिचारा कोशिश तो कर रहा है अब काम नहीँ मिल रहा है तो ये क्या करे।" "तुम्हीं ने इसका दिमाग खराब कर रखा है तुम लोगों ने मेरा जीना हराम कर दिया है।"महेश चंद गुस्से से कहते हुए बाहर चले गये।अमर भी गुस्से में बाहर की ओर चला गया।"खाना तो खा जा बेटा।"माँ कहती रह गई। रोज-रोज के तानों से तंग आकर अमर अपनी साइकिल पर सवार होकर चल दिया।आज अमर मन ही मन अपनी किस्मत को कोसते हुए बेहद गुस्से में घर से निकला था।गाँव से थोड़ा दूर आकर अचानक गाँव के ही एक अधेड़ व्यक्ति ने बीच सड़क पर खड़े होकर उसका रास्ता रोकते हुए ताना मारा,"क्यों बे निकम्मे आज कहाँ चला आवारागर्दी करने।" सामने से हठ जा ताऊ मेरा वैसे ही दिमाग खराब है।" "तो क्या कर लेगा मेरा तू भोसड़ी के बदमाशी दिखा रहा है मुझे साले इतना मारूँगा की सारी हेकड़ी निकल जायेगी,समझा।"उस आदमी के मुंह से निकली गालियों ने आग में घी डालने का काम कर दिया।अब अमर के गुस्से का ठिकाना नहीँ रहा।उसने साइकिल स्टैंड पर खड़ी की औऱ पास में पड़े एक डंडे को उठा कर जोर से उस आदमी के सर पर दो-तीन वार कर दिये।आदमी वहीँ ढेर हो गया।अमर डंडा लेकर घर वापस आया औऱ अपने बेड के पीछे छुपा कर चला गया। गुस्से में ही सही मग़र अमर से एक अपराध तो हो चुका था।अब वो औऱ गुस्से में था साथ ही उसे अपराध बोध भी हो रहा था।काश वो अपने गुस्से पर काबू कर लेता तो ये सब नहीँ होता।वो अपने खेत पर जाकर बैठ गया औऱ सोचने लगा कि अब क्या करूँ?उधर गाँव मे उस आदमी की हत्त्या की खबर आग की तरह फैल चुकी थी।गाँव मे पुलिस भी पहुँच चुकि थी।परंतु ये किसी को भी नहीँ पता था कि इसे मारा किसने है?क्योंकि वारदात के समय इत्तेफाक से तीसरा कोई औऱ वहाँ था ही नहीँ।पुलिस बॉडी पोस्टमार्टम के लिए साथ ले गई। काफ़ी देर बाद अमर घर आया।उसके पिता भी आ चुके थे।माँ ने दोनों को खाना परोसा दिया।खाना खाते हुए,"आज गाँव के बाहर किसी ने प्रधान के भाई के खून कर दिया,पुलिस बॉडी ले गई,पता नहीँ किसने औऱ क्यों मार दिया?" "हाँ शोर तो बहुत हो रहा था,इनके दुश्मन भी तो बहुत हैं,जब देख़ो प्रधानी की धोंस में किसी को भी गाली बक देते हैं किसी की पिटाई कर देते हैं इनके साथ तो ऐसा ही होना चाहिए था।"माँ बोली।अमर दोनों की बातें चुपचाप सुनता रहा,खाना खा कर वो बाहर चारपाई पर जा कर लेट गया।घर के क्लेश गुस्से औऱ नोकरी न मिलने की कुंठा में ये सब हो गया।परन्तु अब बहुत देर हो चुकी थी।। उधर प्रधान ने अज्ञात के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाई औऱ पुलिस पर दवाब भी बनाया की जल्द से जल्द हत्त्यारे को पकड़े।पुलिस छानबीन में जुटी थी मगर कोई सफलता हाथ नहीँ लग रही थी।न मडर करने वाला हाथ आ रहा था औऱ न ही जिससे मडर हुआ वो हथियार ही मिला था।ऊपर से प्रेशर पड़ रहा था।अब पुलिस कमिश्नर ने प्लान बनाया की किसी मुजरिम को पकड़कर प्रधान के भाई के खूनी के रूप मे कोर्ट में पेश कर के फाइल बंद करते हैं अपनी जान छुड़ाते हैं।एक टीम बनाकर काम पर लगा दिया जाता है। अगले दिन अपने कुछ दोस्तों के साथ अमर गांव के मंदिर के बाहर बैठा था तभी एक आदमी आया औऱ बताने लगा कि पुलिस ने वो हथियार बरामद कर लिया है जिससे हत्त्या हुई थी अब खूनी भी जल्दी पकड़ा जाएगा।अमर तुरंत उठ कर घर जाता है औऱ बेड के पीछे देखता है कि उसका छुपाया डंडा तो अब भी वहीँ पर है।वो समझ जाता है कि पुलिस खुद को बचाने के लिए किसी बेगुनाह की बलि चड़ाने वाली है।अब उसे लगता है कि उसके चक्कर मे एक औऱ बेगुनाह मारा जाएगा।पुलिस ईमानदारी से अपना फर्ज नहीँ निभा रही थी।काफी सोच विचार के बाद अमर सारी घटना अपने माँ-बाप को बता देता है।वो कहता है कि अब वो समर्पण कर देगा।माँ-बाप बेहद दुखी होते हैं औऱ रोने लगते हैं, उनका इकलौता बेटा क्लेश के चक्कर मे कैसे मुसीबत में फंस गया।मगर अब देर हो चुकी थी। अगली सुबह अमर खुद थाने पहुँच कर समर्पण कर देता है औऱ अपना गुनाह कबूल कर लेता है।पुलिस हैरान भी है औऱ ख़ुश भी थी कि आखिरकार खूनी खुद ही आ गया।अब पुलिस फ़ाइल तैयार कर अमर को कोर्ट में पेश करती है।पुलिस अपनी वाहवाही के लिए झूठे गवाह झूठा हथियार कोर्ट में पेश करती है।सरकारी वकील पुलिस की तरफ से बहस करता है औऱ झूठे गवाह पेश करता है।अमर खामोशी से सब देख व सुन रहा है।कोर्ट में प्रधान व गांव के अन्य लोग भी मौजूद हैं।अमर के माता-पिता भी बैठे हैं। सरकारी वकील औऱ पुलिस झूठे गवाह पेश करते रहे बहस चलती रही,अंत मे जज साहब ने अमर से पूछा,"तुम्हें अपनी सफाई में कुछ कहना है।"अमर मुस्कुराया।जज साहब,"तुम पर मडर का केस चल रहा है औऱ तुम्हें हँसी आ रही है,इससे पहले मैं सजा सुनाऊ कुछ मन में हो तो बोल दो।" अमर,"मैं कोर्ट से माफी चाहता हूँ परन्तु हँसी मुझे सरकारी वकील साहब औऱ पुलिस पर आ रही है।" "क्या मतलब?"जज साहब बोले।अमर,"मैं कोर्ट को सच से अवगत कराना चाहता हूँ, कि न तो पुलिस ने मुझे गिरफ़्तार किया है औऱ न ही ये सभी गवाह असली हैं औऱ न ही ये वो हथियार है जिससे मैंने हमला किया था।अभी तक कोर्ट में जो कुछ भी पेश किया गया वो सब झूठ औऱ कोर्ट को गुमराह करने की कोशिश थी।असल मे पुलिस पूरी तरह नाकाम औऱ असफल रही है।" "ये तुम कैसे कह सकते हो?"वकील साहब टोकते हैं।अमर"कत्ल मेरे द्वारा हुआ है तो सच भी मैं ही जनता हूँ औऱ ये कोई सोची-समझी साजिश नहीँ बस दुर्घटना मात्र थी।" "साफ-साफ कहो जो कहना है"जज साहब।अमर विस्तार से बताता है,"जज साहब मैंने वकालत की डिग्री हॉसिल की है,मग़र अभी तक मुझे न तो नोकरी मिली न ही मैं अलग से काम शुरू कर पाया हूँ।मैं बेहद गरीब परिवार से हूँ।आये दिन मेरे खाली रहने की वजह से घर मे क्लेश होता आया है।जिस दिन ये घटना हुई उस दिन भी में पिता की डांट औऱ ताने सुनकर गुस्से से बाहर निकला था।प्रधान जी का भाई पहले से ही बीच सड़क पर खड़ा था मैंने बचने को कहा तो उसने भी गालियों की बौछार कर दी औऱ ताने देने लगा।मैं पहले से ही गुस्से में था इसने मेरा गुस्सा औऱ भड़का दिया,मैंने वहीँ पास में पड़े एक डंडे से उसके सर पर वार कर दिया।उसने घटनास्थल पर ही दम तोड़ दिया।वो डंडा मैंने अपने बेड के पीछे छुपा दिया जो अब भी वहाँ है औऱ उस पर खून के निशान भी हैं,लेकिन जब मुझे पता चला कि पुलिस अपनी नाकामी छुपाने के लिए औऱ झूठी वाह वाही लूटने के लिए किसी बेगुनाह को फंसाने की तैयारी कर रही है तो मुझसे बर्दाश नहीँ हुआ।मैंने सबसे पहले अपने माता;पिता को सब बताया जिससे वो भी अनजान थे फिर में खुद थाने पहुँचा औऱ पुलिस को घटना से अवगत कराया औऱ समर्पण कर दिया।मैं चाहता तो पुलिस तो क्या किसी को भी खबर नहीँ होती मग़र मेरे जमीर ने गवाही नहीँ दी।मैं चाहता हूँ कि मेरे बेड के पीछे रखे डंडे को मंगाया जाये उस पर लगे खून के निशान की जांच कराई जाए,सच सबके सामने आ जायेगा,ये पुलिस गवाह औऱ वकील सब झूठे हैं।इनके खिलाफ भी कानूनी कार्यवाही की जाए।मैं न आता तो किसी बेगुनाह को फाँसी पर चड़ा देते।जो कुछ भी हुआ उसका मुझे बेहद अफसोस है,बस मुझे औऱ कुछ नही कहना है।" कुछ पल के लिये कोर्ट में सन्नाटा छा गया।एक लंबी सांस लेते हुए जज साहब ने अपना फैसला सुनाया,"ये कोर्ट पुलिस की साजिश औऱ नाकामी के लिए सस्पेंड करती है साथ ही पुलिस कमिश्नर को भी सस्पेंड किया जाता है।साथ ही मुजरिम के घर से डंडा बरामद करके जांच के लिए भेजा जाए,वकील साहब की डिग्री निरस्त की जाती है साथ ही इनके खिलाफ भी कोर्ट अपना फैसला सुनाएगी।वो भी गवाह के तौर पर पेश हुए हैं उन्हें तीन-तीन साल की सजा औऱ पचास-पचास हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाती है।मुजरिम ने जुर्म तो किया है मगर किसी साजिश के तहत नहीँ बल्कि एक दुर्घटना वश उठाया गया कदम माना जाता है।परंतु जिस सच्चाई से समर्पण किया औऱ कोर्ट को सच्चाई से अवगत कराया है वो भी प्रशंशनिये है।ये अदालत मुजरिम को दस साल की कैद औऱ पांच लाख रुपये जुर्माना भरने की सजा सुनाती है,रुपये न जमा कराने की स्तिथि में दो साल की कैद औऱ बड़ा दी जाएगी।कोर्ट बर्खास्त की जाती है।" यही कहानी का अंत है।यह कहानी काल्पनिक है,इसका किसी भी घटना से कोई सम्बन्ध नहीँ है।। लेख़क। -------------- अरिनास शर्मा --------------------------- -----------------------------
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