Sunday, July 20, 2025

एक सवांद।

लेख़क की क़लम से निकले कहानी के सभी पात्र काल्पनिक होते हैं।कुछ पात्र स्वम् को सर्वश्रेष्ठ मानकर अहंकार रूपी व्यवहार करने लगते हैं,परन्तु वो ये भूल जाते हैं कि उन्हें गड़ने वाला केवल लेख़क होता है,औऱ उन्हें ख्याति दिलाने वाला वो पाठक होता है जो उन्हें बार-बार पड़ता है।किसी भी पात्र की भूमिका लेख़क के क़लम से निकली कल्पना मात्र ही होती है।पात्र हीरो हो या विलन वो फ़िल्मी पर्दे पर रचा गया हो या वास्तविक जीवन में,स्वयं का कुछ नहीँ होता है।कहानी के काल्पनिक पात्रों की तरह हम-सभी पृथ्वी पर जीवत मानव जाति हो या पशु-पक्षी हों या जल में विचरने वाले जीव हों,सभी प्रभु की रची रचना का मात्र एक हिस्सा हैं।हम वही करते हैं जो प्रभु ने हमारे अंदर कहानी का समावेश किया है।बात की हो या युगों पहले की घटित घटनाएं ही क्यों न हों।सभी पहले से ही तय हो चुका होता है।द्रोपती का चीर हरण कराने वाला दुर्योधन दुष्ट था या माँ सीता का अपहरण करने वाला रावण क्रूर था,परन्तु प्रश्न यह भी उठता है कि जब धृतराष्ट्र की सभा में भीष्मपितामह औऱ अनेकों धर्मगुरु विराजमान थे तो दुर्योधन इतना बड़ा दुस्साहस कैसे कर पाया,क्या मौन रहने वाले भी पाप के भागीदारी नहीँ बने औऱ यदि बने तो उनको क्या दंड मिला,रावण तो स्वम् शिवजी का सबसे बड़ा भक्त था तो उसने ये अपराध कैसे किया,क्यों सभी देवता मौन होकर देखते रहे,परन्तु ये भी सत्य है कि सभी को अपने-अपने अपराधों की क़ीमत चुकानी पड़ी थी।ऐसा नहीँ था कि केवल दुर्योधन औऱ रावण को ही दंड मिला।क़िसी ने अपना कुल का विनाश होते देख़ा तो क़िसी ने अपने पुण्य को नष्ट होते देख़ा,आँसू तो प्रत्येक की आँखों से गिरे,क़िसी के आँसू विजय की ख़ुशी के थे तो क़िसी के आँसू ग़म औऱ दर्द के थे कोई आँसू पोंछ रहा था तो कोई आँसू छुपा रहा था।सब ने अपना-अपना कर्म किया औऱ सभी को अपने कर्मो के परिणाम स्वरूप दंड भोगना पड़ा।तो ये अवश्य याद ऱखना चाहे तुम कहानी से उपजे हीरो हो या प्रभु के बनाये जीवित मानव तुम मात्र एक कल्पना हो,प्रभु की कल्पना।अहंकार, ईर्ष्या,क्रोध को दूर कर प्रेम की भाषा बोलो,प्रेम से रहना सीखो,भेद-भाव भुलाकर एक-दूसरे के सुख-दुःख के भागीदार बनो।तुम्हारे करनी-कथनी में कोई फ़र्क नहीँ होना चाहिए।अच्छा सोचोगे,अच्छा करोगे तो प्रभु के स्नेह के पात्र बन कर स्वयं के जीवन को धन्य कर लो।लोभ-लालच,छल-कपट केवल कष्ट की राह पर ही लाकर ही खड़ा कर देते हैं, वहाँ न अपनों का ही साथ होता है औऱ न ही प्रभु की दया के पात्र बन पाते हैं, भले ही तुम प्रभु की कल्पना हो परन्तु सार्थक जीवन जीकर स्वम् को मोक्ष अवश्य दिला सकते हो।           नेक बनो-एक बनो।                                                                                                                लेख़क।                                                                             -------------------                                                                   अरिनास  शर्मा                                                                    ---------------------------------                                                        ----------------------------------

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