Monday, December 16, 2024

आज का दौर

आज की सबसे बड़ी विडंबना ये है कि आज यूट्यूब औऱ गूगल के दौर में हर आदमी बिना स्कूल जाए इतना बुद्धिमान हो गया है कि वो आप की बात बीच मे ही काट के अपना ज्ञान परोसने में लग जाता है औऱ उसका पहला उद्देश्य आपको मूर्ख औऱ खुद को होशियार साबित करना होता है।अब समस्या तब पैदा जोती है जब ज़रूरत से ज्यादा बने आदमी का सामना असल जिंदगी में असल मुसीबत से होता है तो उसका मोबाइल ज्ञान धरा का धरा रह जाता है।                                                   आप की उम्र आपका अनुभव वो प्राप्त करने योग्य ही नहीँ हैं जो पूर्ण रूप से मोबाइल ज्ञान के शिकारी हो चुके हैं।यदि वो क़िसी कारण से आपकी बात सुन भी लेते हैं तो भी अंत में निर्णय उन्हीं का होता है,क्योंकि उनसे ज्यादा ज्ञान क़िसी को हो ही नहीँ सकता है।उन्हें ये भी बर्दाशत नहीँ होता है कि उनके सामने आपको कोई होशियार बता दें औऱ उनकी बात का वज़न कम हो जाये,तो बता दूं कि ऐसे आदमियों से सावधान रहें औऱ दूरी बनाए रखें जो अपना जीवन अपनी यात्रायें यूट्यूब औऱ गूगल के शेयर व्यतीत कर रहे हैं।          ये महान पुरुष क़भी क़िसी की न तो सुनते हैं न ही क़िसी को सम्मान देना पसन्द करते हैं,ये वो लोग हैं जो बीच सड़क पर अपने बाप की बेज्जती करने से भी परहेज़ नहीँ करते हैं।अब अपना मान-सम्मान बचाये ऱखने के लिए ऐसे लोगों को चिंहित करें औऱ ख़ामोशी से अपना जीवनयापन करें।हँसते रहें मस्त रहें।                                     अरिनास शर्मा।

Sunday, December 15, 2024

तपस्या

कई वर्ष पुरानी बात है,एक गाँव में एक परिवार में बाल विवाह हुआ,रीति रिवाज़ों के अनुसार बधू वर के घर पांच दिन रही औऱ छटे दिन वो अपने पिता के घर वापिस आ गई।                                                                 रिवाजों के अनुसार जब दोनों बालिग़ हो जाएंगे तो पति अपनी पत्नी को पिता के घर से विदा करा कर ले आता है।अब समय गुजरा दोनों बच्चे बड़े हो गये।एक दिन पड़ोस में एक मेला लगा हुआ था,दोनों परिवार मेले में आये हुए थे।लड़की को अकेला घूमता देख अचानक लड़के ने देख़ा तो पहचान गया परन्तु लड़की ने नहीँ पहचाना।                                                                                                  जब लड़के ने लड़की को रोक कर हालचाल पूछे तो लड़की ने ग़ुस्से में कहा,जान न पहचान तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे रोकने की।लड़के ने हसँ कर कहा,अरे तुम मुझे भूल गईं, चार दिन मेरे घर मेरे साथ रही हो और अब पहचान भी नहीँ रही हो।लड़की को साथ सोने की बात सुनकर ग़ुस्से में लड़के के गाल पर चपत मार दिया।लड़का गुस्से में वहाँ से चला गया।                                                        जब लड़की के घर वालों को पता चला तो उन्होंने लड़की को समझाया।लड़की बोली मेरी कोई ग़लती नहीँ थी कम से कम मुझे बताना चाहिए था मैं पहचान ही नहीँ पाई थी।अब समय आया बिदाई का तो लड़के ने साफ़ मना कर दिया।बोला,जिसनें मेले में मेरे चपत मार दिया उसे बुलाने का मतलब ही नहीँ है।जब घर वालों ने बहुत समझाया तो उसने ये शर्त रख दी कि यदि वो माफ़ी मांग ले तो में बुला लाऊंगा।जब ये ख़बर लड़की वालों के यहाँ पहुँची तो लड़की ने माफ़ी मांगने से तो मना कर दिया परन्तु ये बता दिया कि यदि वो बुलाने का जाए तो में चली जाऊँगी।                                                                                                बस लड़की ने माफ़ी नहीँ माँगी औऱ लड़का क़भी बुलाने नहीँ गया।समय गुज़रता गया दोनोँ की उम्र गुज़रती गई,पिता ने समझ लिया की बेटी ज़िद्दी है अब नहीँ जाएगी तो बेटी के नाम दस बीघा ज़मीन कर दी।ताकि आगे चल कर उसे क़िसी के आगे हाथ न फैलाने की ज़रूरत न पड़े।समय औऱ गुजरा बेटी के माता-पिता का भी देहांत हो गया।बेटी एक स्कूल में टीचर बन गई थी।        दोनोँ ने अलग शादी भी नहीँ की थी।एक दिन सुसराल से ख़बर आई कि पति की तबियत बहुत ख़राब है अब वो उम्र के अंतिम पड़ाव पर है,एक बार आकर मिल लो।लड़की ने सोचा पूरे जीवन तो मुझे बुलाने नहीँ आया अब जाने से क्या फ़ायदा।मग़र मानवता के नाते वो एक बार मिलने ससुराल गई औऱ पति से मिली।पति नेपूछा,आ गईं चलो मैंने तुम्हें माफ़ किया,सब भूल जाना।पति ने अंतिम सांस ली।                                   पति के ज़ायदाद के कागज़ घर वालों ने पत्नी के हाथ मे रख दिये।पत्नी ने कहा जब जीते जी ये मुझे लेकर नहीँ आये तो में इस दौलत का क्या करूँगी।उसने सारी दौलत उनके भाईयों के नाम कर दी औऱ वापस अपने घर आ गई।उसने कमरा अंदर से बंद कर लिया औऱ उसने भी अपनी अंतिम सांस लेकर अपना सफ़र पूरा किया।                                                              यह कहानी पात्र जगह सभी काल्पनिक हैं।                                                                                              अरिनास शर्मा।

त्याग

देवपुर गाँव मे एक छोटा परिवार रहता था,माँ-बाप और चौदह साल का बेटा,खेती करके अपना पालन-पोषण कर रहे थे।सब कुछ ठीक चल रहा था कि एक दिन दुःखद घटना घट गई।अचानक पत्नी के पेट मे दर्द उठा इससे पहले कुछ समझ आता पत्नी का देहांत हो गया।                    पिता और चौदह साल का बेटा,रो-रो कर बुरा हाल हो गया।गाँव के लोगोँ ने समझाया कि बेटा अभी बहुत छोटा है दूसरा विवाह कर लो।पिता ने बिना विवाह किए बेटे को पालने का निर्णय किया।बेटा जब उन्नीस साल का हुआ तो पिता ने बेटे का विवाह कर दिया।परिवार में फ़िर खुशियाँ आ गईं।मग़र विधाता को तो कुछ और ही मंजूर था।एक वर्ष में बेटे का भी देहांत हो गया।परिवार पर एक बार फ़िर दुःखों का पहाड़ टूट गया।अब पिता औऱ बेटे की विधवा पत्नी रह गए थे।                                                                                   एक दिन पिता ने अपनी विधवा बहु को समझाया कि बेटी अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है अगर तुम कहो तो में अच्छा सा लड़का देखकर तुम्हारा विवाह कर देता हूँ, तुम्हारा जीवन आराम से व्यतीत हो जायेगा।।परन्तु बहु ने विवाह करने को औऱ घर छोड़ने को साफ़ मना कर दिया।बहु ने पिता को समझाया कि,पिताजी में तो अब उनकी यादों के साथ आपके पास ही रहूँगी,परन्तु आप अपना दूसरा विवाह कर लीजिये वरना समाज हम पर ताने मार-मार कर जीने नहीँ देगा।।पुत्र बहु के दबाव में आ कर न चाहते हुए भी पचपन वर्षीय पिता को विवाह करना पड़ा।।                                                                  अब पुत्र बहु ने अपनी सास का अभिनन्दन किया औऱ सास-ससुर की सेवा में लग गई।मग़र पिता ने अपनी पत्नी से भी अपनी पुत्र बहु को पूरा सम्मान दिलवाया।समय बीता अब ससुर के दो बेटे हुए, बेटे बड़े हुए, पुत्र बहु ने अपने सामने ज़मीन का बंटवारा कराया।आधी-आधी ज़मीन दिनों बेटों के नाम कराई।अंत में उम्र की दहलीज़ पर पहुँचकर पहले ससुर चल बसे औऱ कुछ समय बाद पुत्र बहु भी चल बसी।        आज दोनोँ बेटे अपने परिवार के साथ ख़ुशी-ख़ुशी जीवन बिता रहे हैं, औऱ पुत्र बधू के त्याग के चर्चे आज भी आस-पास गाँव मे होते हैं।यही कहानी का अंत है।कहानी के पात्र व घटनाएं काल्पनिक हैं।                                                            अरिनास शर्मा।

Thursday, September 19, 2024

सादगी

दस हज़ार करोड़ के मालिक आनन्द शर्मा का बेटा अपनी अमीरी से परेशान होकर अपने पिता का घर व दौलत छोड़ कर एक छोटी बस्ती में जा कर रहने लगता है।                                                                     विजय वहीं के एक गैराज में काम करने लगता है।बस्ती की एक लड़की प्रिया विजय से प्यार करने लगती है मग़र विजय उससे दूरी बनाकर रहता है।आनन्द शर्मा के बिज़निस पार्टनर अनवर खान बिज़निस हड़पने के लिए  शर्मा के बेटे को मारना चाहता है।कम्पनी का एक बन्दा जोकि विजय का ख़ास है,उसे इस षड्यंत्र के वारे में बता देता है,औऱ सावधान रहने को कहता है।एक दिन गैराज में कुछ लोग कार ठीक करवाने आते हैं, उन्हें विजय पर शक हो जाता है।                                               एक आदमी अनवर को बता देता है कि एक लड़का यहाँ गैराज में काम करता है जो विजय से बहुत मिलता है।अनवर उस पर नज़र रखने को कहता है।एक दिन कुछ गुंडे प्रिया का अपहरण करने की कोशिश करते हैं।विजय अचानक पहुँच जाता है औऱ प्रिया को बचा लेता है।प्रिया विजय की असलियत से बेख़बर है।विजय एक दिन अपने पिता को अनवर अंकल से सावधान रहने को कहता है औऱ उनके मनसूबे के बारे में बताता है।                                         शर्मा को इस ख़बर से झटका लगता है।शर्मा अपने बेटे की सेफ़्टी के लिए कुछ बॉडीगार्ड लगा देता है।एक दिन विजय अपने कमरे मे चाय बना रहा था तभी प्रिया आकर पूछती है कि वो इतना चुप औऱ उससे दूर क्यों रहता है।"तुम बहुत अच्छी लड़की हो मग़र मेरे बहुत दुश्मन हैं औऱ मैं नहीँ चाहता कि मेरे कारण तुम बेमौत मारी जाओ,इस लिए बेहतर होगा तुम मुझसे दूर रहो"विजय उससे जाने को कहता है।प्रिया ग़ुस्से में चली जाती है।एक दिन प्रिया विजय से मिलने गैराज पहुँच जाती है,तभी अचानक कुछ लोग विजय पर हमला कर देते हैं, विजय भी भिड़ जाता है परंतु उसके पिता के भेजे बॉडीगार्ड उन बदमाशों को मार कर ग़ायब हो जाते हैं।                           पुलिस पहुँच जाती है औऱ बदमाशों की बॉडी एम्बुलेंस से भेज देता है।दरोग़ा बताता है कि वो चिंता न करे मुझे तुम्हारे पिता ने भेजा है।मै सब देख लुँगा।वो वहाँ से चला जाता है।गैराज का मालिक हैरान होकर विजय से पूछता है कि बदमाश कौन थे औऱ दरोगा तुम्हे कैसे जानता है।विजय गैराज मालिक औऱ प्रिया को एक केबिन में ले जाता है औऱ अपने वारे में सब सच बता देता है।गैराज मालिक माफ़ी मांगने लगता है,पर विजय उसे तसल्ली देता है कि वो सब ठीक कर देगा।प्रिया भी हैरान है,कि इतने अमीर बाप का बेटा इस छोटी सी वस्ती में उन सब के बीच रह रहा था।विजय प्रिया को देखकर मुस्कुराता है।                              अब विजय इस किस्से को खत्म करना चाहता है।वो ऑफ़िस में अपने मैनेजर को अपनी योजना बताता है।अनवर उधर अब पहले आनन्द को मारने की योजना बनाता है औऱ आनन्द को दूसरी फेक्ट्री में बहाने से बुलाता है,जहाँ उनके आदमी तैनात हैं।विजय पुलिस को अवगत कर देता है।पुलिस औऱ विजय भी पहुँच जाते हैं।लम्बी लड़ाई होती है औऱ अनवर पुलिस की गोली से मारा जाता है।उसके कुछ आदमी मारे जाते हैं औऱ बाक़ी को पुलिस गिरफ्तार कर लेती है।अंत मे विजय वापिस बस्ती जाकर प्रिया से पूछता है कि मुझसे शादी करोगी।प्रिया ख़ुशी से रो पड़ती है औऱ विजय से लिपट जाती है।यही कहानी का अंत है।

Saturday, September 7, 2024

क्रोध

अनन्तकाल से क्रोध आदमी के विनाश का,शत्रुता का कारण बना हुआ है।क्रोध से न क़िसी को क़भी कोई लाभ हुआ है न ही कोई उतपत्ति हुई है,फ़िर भी न जाने क्यों सत्य जानते हुये भी आदमी इस क्रोध रूपी राक्षस के कारण कितने प्रिये रिश्तों से हाथ धो बैठा है।                                     आज के काल में लालच,लेन-देन,उधारी,मज़बूरी औऱ न जानें कितने ऐसे कारण हैं जिस वजह से अपने-अपनों से दूर होते जा रहे हैं।व्यर्थ की मोहमाया के कारण आपस मे दीवारें खड़ी हो रहीं हैं।एक-दूसरे के साथ तो दूर पास-पास भी रहना गवारा नहीँ है।क़भी सोचा है कि हम किस दिशा में जा रहे हैं या हम अपने बच्चों को किस दिशा मे धकेल रहे हैं?ज़रा सोचिए।                 क्रोध के रहते अपना भविष्य अपने रिश्ते बिगाड़ने हैं या स्वम् को अपने बच्चों को बेहतर भविष्य अनमोल रिश्ते देने हैं।रुपये कमाये जाते हैं ख़र्च किये जाते हैं मग़र रिश्ते सिर्फ़ कमाये जाते हैं ख़र्च सिर्फ़ अपनों पर किये जाते हैं।तुम्हें रिश्ते चाहिये या दौलत।सोचना तुम्हें है।रिश्तों में ये भी हिसाब नहीँ ऱखते कि किसने कम किया या किसने ज्यादा किया,बस दोंनो हाथ खोल कर दिया जाता है।हिसाब तो केवल व्यापार में होता है औऱ जहाँ व्यापार होता है वहाँ रिश्ते नहीँ टिकते हैं।   समझ लो तो सब बच जायेगा वरना सब बिखर जायेगा।

पिता-सत्संग

सत्संग में जाकर बैठ जाओ या पिता के पास कुछ देर बैठ जाओ,बात एक ही है,मग़र विडम्बना है कि हम अमल किसी की बात पर भी नहीँ करते हैं।बेटियाँ विवाह उपरांत भी अपने माँ-बाप को नहीँ छोड़ पाती हैं औऱ बेटा अपने माँ-बाप को तुरंत त्याग देता है।बेटे को अपने पिता का घर जेल लगने लगता है तो बहु को ससुराल पक्ष के दुश्मन नज़र आने लगते हैं।सास-ससुर की हर बात लाख रुपये की होती है तो पिता की बातों में व्यंग नज़र आने लगता है।अपने ही भाई-बहन आँखों मे चुभने लगते हैं तो साला-साली घर का ताज़ नज़र आने लगते हैं।                           दुर्भाग्य तो ये कि अपनी औलाद की परवरिश भी ससुरालियों के मार्गदर्शन में होती है।पत्नी की कही हर बात पत्थर की लक़ीर होती है औऱ अपनी माँ बक-बक करती नज़र आती है।पिता को बेज़्ज़त करने में पल नहीँ गवांते हैं,पत्नी से तू भी कह दिया तो कहानी ख़त्म।अगर बेटा बाप के पास कुछ पल गुज़ारे तो उसे बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है,उसकी समस्याओं का समाधान निकल सकता है।पिता वो ज्ञान दे सकता है जो कालेज की किताबों में नहीँ मिल सकता है,क्योंकि पिता के पास जीवन के अनुभव का भंडार होता है,मग़र उससे ज्यादा अच्छा उसे पत्नी से राय लेना ज्यादा अच्छा लगता है औऱ पत्नी तुरन्त अपने मायके फ़ोन कर राय लेकर पति को फॉरवर्ड कर देती है।                                                                     आज-कल का चलन हो गया है कि बस अपने लोग अपने नहीँ हैं बाक़ी सारी दुनियाँ अपनी है।सास-ससुर को माँ-बाप समझने वाले अपने माँ-बाप को खो देते हैं, ससुराल को घर समझने वाले अपने घर से भी वंचित हो जाते हैं।एक दिन ऐसा आता है कि ससुराल से भी उनका परित्याग हो जाता है,माँ-बाप भी खो बैठते हैं।बुरी संगत से अच्छा है कि क़िसी गाँव के बुज़ुर्ग के पास रोज़ एक घण्टा बिताओ तो क़िसी सत्संग में जानें की ज़रूरत नही पड़ेगी,पिता को समझो पिता से बातें करो क़िसी के मशहरे की ज़रूरत नही पड़ेगी।जितनी जल्दी सवेरा हो जायेगा जीवन का अंधकार उतनी जल्दी दूर हो जायेगा।         अगर काटें औऱ फ़ूल का फ़र्क समझते हो तो अपने-पराये का औऱ दुश्मन-दोस्त का भी फ़र्क समझना होगा,वर्ना सिर्फ़ तुम होंगे मग़र आस-पास कोई औऱ तुम्हारा नज़र नहीँ आयेगा, क्योंकि भृम के रिश्ते तब-तक तुम्हें खोखला कर चुके होंगे।समझदार को ज्यादा समझने की ज़रूरत नहीँ होती है।

Sunday, August 25, 2024

देवदत्त

राम नगर की क्राइमब्रांच में काफ़ी चहल-पहल है।एक अजीब केस आया है।पहाड़ी पर एक नरकंकाल मिला है,जो कि काफ़ी पुराना है।हेडऑफिस का दवाब भी है कि जल्द से जल्द इसे सुलझाया जाए।इसे सुलझाने के लिये मुम्बई क्राइमब्रांच से इंस्पेक्टर देवदत्त को बुलाया गया है,जो अपने काम मे माहिर है,औऱ सख़्त भी है।                                             देवदत्त के आने से सभी एलर्ट हो जाते हैं।देवदत्त पहले कंकाल मिलने की जगह पर मुआयना करता है।देवदत्त की एक कमज़ोरी है,समोसा।देवदत्त,"तुम्हारे यहाँ समोसे नहीँ मिलते हैं क्या?"जूनियर,"मिलते हैं न सर"देवदत्त,"ठीक है,तो मंगा लो जब पेट मे समोसा नहीँ जाता साला दिमाग़ भी काम नही करता है,औऱ हाँ हरी चटनी ज़रूर लेते आना"देवदत्त समोसे ख़ाता हुआ जगह देखता है औऱ वापिस थाने का जाता है।वो कंकाल की फ़ाइल मंगाता है।मेज पर फाईल, समोसे,चाय ऱखी है।देवदत्त फाईल देखता है औऱ कहता है कि तुम लोगों की कार्यवाही बहुत धीमी है,चलो अब काम पर लग जाओ।देवदत्त कंकाल का x रे करवाने को कहता है।।                           एम्सरे से पता चलता है कि इसका तो उल्टा हाथ आधा है ही नहीँ।डॉक्टर बताता है कि कंकाल कम से कम दस साल पुराना है।देवदत्त पूरे इलाके मे खोजबीन करता है तो पता चलता है कि एक लड़का जो 15 साल का था अचानक लापता हो गया था।पूछताछ में उस लड़के का घर मिल जाता है।देवदत्त लड़के के पिता से मिलकर कंकाल की जानकारी देता है औऱ बताता है कंकाल का हुलिया तुम्हारे बेटे से मिलता है।पिता रोने लगता है,देवदत्त उसे विश्वाश दिलाता है कि वो उसके बेटे के कातिल को जरूर पकड़ेगा।वो बताता है कि एक दिन उसका बेटा खेत पर गया था फ़िर वापस नहीँ आया।बचपन से उसका उलटा हाथ कोहनी से आधा ही था।                                                            देवदत्त को पता चलता है कि पुराने प्रधान का खेत मिला होने के कारण अक्सर उसकी नोकझोंक होती रहती थी।प्रधान क्रमनल प्रवर्ति का है।देवदत्त चाय समोसे का आनन्द ले रहा है साथ ही केस पर भी चर्चा हो रही है,तभी कुछ गुंडे टाईप के कुछ लोग ऑफिस में आ जाते हैं औऱ देवदत्त को धमकाते हुए कहते हैं कि परधानजी ने बुलाया है।देवदत्त हँसते हुए कहता है कि अरे इसी दिन का तो इंतज़ार था मुझे, परधानजी से कहना चाय समोसे तैयार रखना ,हम आते हैं शाम को।वो लोग चले जाते हैं।जूनियर बताते हैं कि ये बहुत ख़तरनाक आदमी है हमें सावधान रहना होगा।देवदत्त'"अगर इतना डरते हो तो क्राइमब्रांच में क्यो आ गए कोई औऱ नोकरी कर लेते,चलो अब देखता हूँ कितना खतरनाक है ये"                                      देवदत्त अपनी टीम के साथ परधानजी के घर पहुँच जाता है,बातों-बातों में प्रधान देवदत्त को धमकी देते हुए इस केस को बंद करने को कहता है।जाते हुए देवदत्त कहता है,"आपके यहाँ के समोसे बहुत अच्छे हैं लेकिन हमारे यहाँ भी बहुत अच्छे चटनी के साथ मिलते हैं, हाँ एक बात औऱ आप नींद पूरी करलो क्योकि जेल में मच्छर बहुत हैं साले सोने नहीँ देते हैं, अगली मुलाकात अब जेल में ही होगी।"देवदत्त टीम को लेकर चला जाता है।एक दिन गाँव का ही एक आदमी जो कि मुख़बिर है बताता है कि उस लड़के को इसी ने गला दबा कर मारा था।तो फिर पहले क्यो नहीँ बताया तुमने,के बार कोशिश की बताने की मग़र यहाँ सब प्रधान के डर की वजह से मुझे चुप रहने को कहते थे औऱ बाहर से ही वापस भेज दिया कर देते थे।                  देवदत्त प्रधान का अरेस्ट वारंट निकलवाता है औऱ जल्द ही उसे हवालात में लाकर कड़ी पूछताछ करता है।एक दिन प्रधान के गुंडे देवदत्त को अकेला देखकर हमला कर देते हैं मगर देवदत्त सभी की अच्छी तरह पिटाई कर देता है औऱ सब को अंदर बंद कर देता है।पुलिस की पिटाई से प्रधान टूट जाता है औऱ अपना जुर्म कबूल लेता है।देवदत्त उसे कोर्ट में पेश करता है जहाँ से उसे उम्रकैद होती है।पिता को आखिरकार न्याय मिलता है।देवदत्त वापिस मुंबई आ जाता है।यही कहानी आ अंत है।"कहानी ,शहर,घटना सभी काल्पनिक है"।

Tuesday, May 28, 2024

योग्यता औऱ सभ्यता

योग्यता औऱ सभ्यता दोनों अलग-अलग हैं।लोगों को अक़्सर भृम रहता है कि जो योग्य है वो सभ्य भी होगा,तो ऐसा नहीँ है।योग्यता किताबों का जवाब है तो सभ्यता सस्कारों का परिणाम है।जब बच्चा पढ़ने-लिख़ने में अच्छा होता है तो वो डिग्रियों का पर्वत बना देता है परंतु जब वो आप से बात करता है,व्यवहार करता है तो किताबी ज्ञान से ज्यादा सस्कारों की ज़रूरत पड़ती है,जो स्कूल से नहीँ परिवार औऱ माँ से मिलते हैं, मग़र कुछ बच्चे यहाँ भी विफ़ल हो जाते हैं।जब वो अन्य परिवार की लड़की के सम्पर्क में आते हैं, विवाह बंधन में बंध जाते हैं तो पत्नी के सस्कारों के प्रभाव में आते ही उनके अपने सस्कार डिलीट हो जाते हैं, जैसे कोई बिलेकबोर्ड पर डस्टर फ़ेर देता है।आज-कल ऐसे परिणाम ज्यादा देखने को मिल रहे हैं।उन्हें बताया जाता है कि तुम्हारे माँ-बाप ने तो तुम्हारा जीवन ही बिगाड़ दिया,उन्होंने तुम्हारे लिए कुछ किया ही नहीँ।औऱ ये बिचारे पत्नी भक्त जिन्हें इतना प्यार क़भी मिला ही नहीँ पत्नी के चरणों मे नतमस्तक हो जाते हैं, रही-सही कसर पत्नी के परिवार वाले अपनी शिक्षा से पूरा कर देते हैं,लड़के को भी लगने लगता है कि अब मुझे सच्चा प्यार औऱ असली माता-पिता के दर्शन हुये हैं,न जानें अब-तक कैसे जीवन जी रहा था।यहाँ पर योग्यता औऱ सस्कारों की लड़ाई शुरू होती है और आखिरकार पत्नी के सस्कारों की विजय होती है।तो इसी लिये कहता हूँ कि हर डिग्री वाला व्यक्ति समझदार हो ज़रूरी नहीँ है।इसका मतलब ये भी नहीँ होता कि अपने अच्छे सस्कार अपने बच्चे को नहीँ दिये हैं।हर माँ-बाप अपने बच्चे को अच्छे से अच्छे सस्कारों से सजाते हैं मग़र कुछ बच्चे होते हैं जो धूप में चमकते शीशे को हीरा समझ बैठते हैं औऱ राह भटक जाते हैं, परन्तु क़भी-क़भी  समझने में इतनी देर हो जाती है कि वापसी के रास्ते भी बंद हो जाते हैं।हालाँकि सभी बच्चे ऐसे नहीँ होते हैं।उनके ख़ून में सस्कार औऱ माँ-बाप ऐसे घुल-मिल जाते हैं कि क़िसी के छल-कपट में वो नहीँ आते हैं औऱ जीवन भर अपने माता-पिता को भगवान समझते हुये उनकी सेवा में अपना जीवन अर्पित का देते हैं, ऐसे बच्चे समाज मे अपना स्थान हमेशा शिखर पर पाते हैं,ईश्वर सदैव उनके साथ वास करते हैं।

Sunday, March 10, 2024

सफ़ाया

दिन में शांत नज़र आने वाला शहर अचानक रात होते ही अपराधों का शहर बन जाता है।कविनगर के एक छोटे से होटल में वेटरी करने वाला लड़का अमन सादगी से अपना जीवन बिता रहा है।अमन के दो रूप हैं,एक वेटर दूसरा रात में अपराधियों का काल।अमन की असलियत उसकी गर्लफ्रेंड ही जानती है।अमन की गर्लफ़्रेंड काज़ल एक पत्रकार है,जो शहर के ही अख़बार"अपनी आवाज़"में काम करती है।शहर का कमिशनर हर्षवर्धन एक ईमानदार ऑफ़िसर है।हर्षवर्धन रात-दिन मुजरिमो को पकड़ने में लगा है मग़र उसी के महकमे का उसका जूनियर अपराधियो से मिलकर उनका सहयोग करता रहता है।अमन रात होते ही जगह-जगह अपराधियो पर काल बनकर टूटता रहता है मग़र सुबह होते ही शांत वेटर बनकर काम मे लग जाता है।काज़ल चाय के बहाने अमन से मिलकर खबरें लेती रहती है।अपराधियो को मिटाने की होड़ में हर्षवर्धन,अमन औऱ काज़ल लगे रहते हैं।अमन-काजल की प्रेम कहानी हर्षवर्धन का अपने जूनियर को रंगे हाथ पकड़ना औऱ अपराधियो को सलाखों के पीछे पहुचाना ही इन तीनो का मक़सद है।

Tuesday, January 23, 2024

विडम्बना

इसे आज की विडंबना ही कहूँगा कि जो कुछ भी हम सुनते आ रहे हैं वो बस मन का एक छलावा मात्र ही निकल कर सामने आया है।अक़्सर जब भी हम अपने बच्चों का रिश्ता करने की बात करते हैं तो दो ही बातें अहम होतीं हैं,कि लड़की औऱ उसके पिता को लड़के की कमाई औऱ बाप की सम्पति की पूरी जानकारी दी जानी चाहिए,परन्तु लड़की के बारे में सिर्फ़ इतना बताना ही काफ़ी है कि वो संस्कारो से भरी है।दहेज़ के वारे में तो ज़िक्र भी नहीँ करना है,वो महापाप में आता है।तो जब दहेज़ कुप्रथा है तो बाप-बेटे की सम्पत्ति का हिसाब-क़िताब कौन सी प्रथा में आता है?क्या लड़के वाला अपनी बहू को रोटी भी नहीँ खिला पाने में सक्षम होता है या बेटा घर मे औऱ बहु को सड़क पर सुलायेगा।तो फ़िर इन सब सवालों को पूछ कर बेटे को उसके पिता को क्यों अपमानित किया जाता है?औऱ दूसरी तरफ़ वही सस्कारों से लदी लड़की एक-दो महीनों के भीतर ही अपनी सुसराल में अपने सस्कारों का ऐसा तांडव मचाती है कि पिता का घर सिर्फ़ पिता का ही घर बन कर रह जाता है,बेटा माता-पिता का न होकर सास-ससुर का बन जाता है।बेटे की ज़िन्दगी पर उसकी कमाई पर सिर्फ़ पत्नी औऱ ससुराल वालों का आधिपत्य हो जाता है।कहाँ से आतीं हैं ये सस्कार वालीं बेटियाँ, कौन सी शिक्षा देते हैं इनके माँ-बाप इनको, क्या बेटे का पिता होना भी अब एक जुर्म है?कहाँ जाएं बेटे के माता-पिता?कौन सा कानून उनको न्याय देने के लिए है?बेटी चाहे तो झूठे दहेज़ के केस में सभी बालिग़ औऱ नाबालिग़ को जेल करा दे,परिवार तो हर हाल में लुटता-पिटता ही है।क्या करें?सस्कार औऱ कानून की जय हो।