Friday, December 26, 2025
वक़्त
आज-कल दर्द में डूबा हुआ फ़िरता हूँ,टूटे हुये दिल को संभाले फ़िरता हूँ,बारिशें चाहें हों जितनी भी,आँसुओं से आँखें धो लेता हूँ,गहरा है अंधेरा रात का,तारों से मन बहला लेता हूँ,दूर होते मेरे अपने मुझ ही से,गैरों को अपना बना लेता हूँ,चंद रोज़ से ही हुए हैं हाथ ख़ाली मेरे,अब तो साये को भी अपने पीछे छोड़ चला हूँ,राहें मेरी मंजिल मेरी पर्वत सी मग़र अड़चन मेरी,जोश बहुत है मग़र ज़िस्म से हार बैठा हूँ,दुनियाँ बड़ी समन्दर जितनी,उम्मीद ज़रा सी मग़र लिये बैठा हूँ,डोलता-फ़िरता जैसे आवारा लहरों पर नाव कोई,कौन पहुँचाये किनारे पर,एक माँझी ढूंढता फ़िरता हूँ,क्या होगी आरज़ू अब जीवन की,बस साँसें अपनी संभाले फ़िरता हूँ,मुहँ मोड़ लेते हैं अपने भी,मैं हँसता था इन बातों पर अक़्सर,ज़िन्दगी समझा रही है,क़िताब के हर पन्ने का सबक,आँखों मे देखकर भी कैसे आँखे चुरा लेते हैं अपने,ज़हर पीकर दवा खोज रहा हूँ,बेमुरव्वत है दुनियाँ आँसू का मोल कुछ नही है,रो-रो कर आँखों को समझा रहा हूँ,कोई नहीँ गर्दीष का गवाह सिवाय मेरी तन्हाई के,ख़ामोशी से बैठ कर ख़ामोशी से ही बात किये जा रहा हूँ,बस सफ़र है बाक़ी जो वो भी गुज़र जायेगा,बस गुंगनाये जा रहा हूँ मुस्कुराए जा रहा हूँ,हाँ-तकलीफ़ तो दे रही है ज़िन्दगी बहुत मुझे,मिल जाये कहीँ मालिक आसमाँ का,आस में इसी जिये जा रहा हूँ। अरिनास शर्मा
Thursday, December 18, 2025
ज़हर-शहर
"ऐसी भी क्या मज़बूरी थी कि गाँव-शहर में भाग गया ज़हर भरी हवा के समन्दर में ख़ुद को डुबा दिया,रोटी तो गाँव में भी थी पर पीज़ा क्यों इस पर भारी पड़ गया,कौन-सी सुविधाओं ने युवाओं को आकर्षित किया कि घर भी छोड़ा अपनों को तोड़ा देकर आँसू चला गया,घर था काम था स्कूल था बाज़ार था सिनेमा था अब तो मॉल ने भी दस्तक दे दी यहाँ पर फ़िर किस ज़रूरत ने मजबूर किया जो घर तुमको घर अपना न लगा,ज़हर भर दिया है हवाओं में क्यों अपने-अपनों के बन गये दुश्मन हैं,ऐसी क्या मज़बूरी है जो वापस तुझको आने नहीँ दे रही है,कर्जे में डुबोता तू ख़ुद को क्यों ख़ुद पर इतना बोझ बड़ाता,न घर अपना न अपना समाज न अपने लोग न अपना हमराज़,बीच में फ़िर भी इन लोगों के क्यों मिलता है इतना सुकून,घर आ जा वक़्त है अब भी सब कुछ है यहाँ भी मोह-माया से रह तू दूर,देर न इतनी कहीँ हो जाये छत भी छुटे अपने भी हो जायें दूर,रुक जा सम्भलज़ा किसकी बातों में जीवन को उलझाए है,छिन जायेगा बिक़ जायेगा ख़ाली हाथ खड़ा होगा जब तू,सब से पहले तेरे क़रीबी भागेंगे तुझको तेरे ही छोड़ कर जायेंगे,जिनके लिये तू ख़ुद को मिटा रहा है जिनके लिये तू अपनों को ठुकरा रहा है ये भी तुझको मिल न पायेंगे,तेरे ग़म में तुझसे पहले जीते जी ये तर जायेंगे,कर ले कोशिश एक आख़री तू बच जायेगा तेरा बृद्ध जीवन,वरना क्या है गाँव-शहर भी मोह-माया का जँगल है,कर फ़ैसला तू ही अब घर में रहना है या जँगल में।" अरिनास शर्मा ------------------------ -------------------------
Sunday, December 7, 2025
डॉक्टर श्री उदय सरन अरमान
7 जून 1932 में ग्राम मुड़िया राजा तहसील बिलारी जिला मुरादाबाद में एक ब्राह्मण परिवार में जन्में श्री मुंशी लाल शर्मा जी केछोटे पुत्र श्री उदय सरन शर्मा जी के विषय में क़िसी ने सोचा भी नहीँ होगा,कि आगे चलकर इस ग्राम के साथ-साथ अपने पिता औऱ तहसील बिलारी का नाम रौशन करेगा। अंग्रेजों के ज़माने में पुलिस में रहे हवलदार के बेटे ने इस मुक़ाम तक पहुँचने के लिये बेहद कड़वे अनुभवों के साथ कठिन मार्ग पर चलते हुये जो मुक़ाम हांसिल किया वो अपने-आप में एक मिसाल बन गया। डॉक्टर उदय सरन जी ने युवा अवस्था में एक साधारण से स्कूल में बतौर अध्यापक नोकरी की,परन्तु उनकी मंज़िल तो कहीँ दूर थी।कुछ समय बाद अपनी नोकरी से त्यागपत्र दे दिया।बाद में क़स्बे के एक चिकित्सक के यहाँ कुछ समय बतौर कम्पाउंडर कार्य किया,मग़र उसमें भी जब मन नहीँ लगा तो वहाँ से भी चले आये औऱ बाक़ी की शिक्षा पूरी की।साथ ही उर्दू की शिक्षा के साथ आपको कहानियाँ औऱ शायरी का भी शौक लग गया।एक समय ऐसा भी आया कि आपकी रुचि को देखते हुए आपके गुरु जी ने लंदन जा कर शिक्षा लेने का भी इंतज़ाम कर दिया,परन्तु माता-पिता कि आज्ञा न मिलने के कारण यहीँ रुककर बाक़ी की शिक्षा पूरी की। सन 1954 में आपने गाँव छोड़कर कस्वा बिलारी में थोड़ी ज़मीन ख़रीद कर अपना छोटा क्लीनिक खोल लिया।एक 12कड़ियों का कमरा औऱ सामने छप्पर डालकर बैठना शुरू कर दिया।यही दिन जीवन का टर्निंग डे बन गया।फ़िर क़भी पीछे मुड़कर नहीँ देखा।एक सफ़ल चिकित्सक के साथ-साथ सफ़ल किसान के रूप में भी अग्रसर रहे।धीरे-धीरे औऱ ज़मीनें ख़रीदीं, चिकित्सा के साथ खेती करना छोटी घर में गऊ शाला जिनका कार्य एक नोकर के सहयोग से ख़ुद करना औऱ भोर के समय अपनी शेरो-शायरी के शौक को निरंतर ज़ारी रखा। उर्दू की अच्छी जानकारी के कारण आज उर्दू के शायरों के बीच में अच्छा मुक़ाम हासिल किया है।आपके द्वारा लिखीं क़िताबों की सूची भी काफ़ी लम्बी है। सन1950 से लिखीं किताबें क्रमशा "डकैत"औऱ "तलवार"नाविल के रूप में सन 1951 में लिखी क़िताब "कुँआरी माँ"नाविल के रूप में,सन1953 में लिखी"शिवाजी"हिंदी खंड काव्य के रूप में,सन1956 में लिखी"महाभारत"काव्य के रूप में,सन1957 में लिखी"अभागा"काव्य के रूप में,सन1958 में लिखी"बेगाना"नाविल के रूप में,सन1959 में लिखी"हक़ परस्ती"नाविल के रूप में,सन1962 में लिखी"अंजाम"नाविल के रूप में,सन1963 में लिखी"ठोकर"हिंदी बाल काव्य के रूप मे,"सत्कार"औऱ सन1964 में लिखी"ज़माना"नाविल के रूप में,सन1971 में लिखी"करमेती का इतिहास"काव्य ग्रन्थ के रूप में,सन1972 में लिखी"जलता देश झुलसती धरती"नाविल के रूप में,सन1982 में लिखी"मुक्तक",सन1983 में लिखी"लाज़बाब"कहानी के रूप में,सन1984 में लिखी"लीख से हटकर"कहानी के रूप में,सन1984 में ही लिखी"उघड़ी काया"कहानी के रूप में,सन1986 में लिखी"इशारा"हिंदी में,सन1998 में लिखी"सनलिकत शेर"सन1998 में ही लिखी"उजले-दामन"कहानी सँग्रह के रूप में,सन1994 में लिखी"प्रीतांजली"काव्य गीत के रूप में,सन1998में लिखी"नाव भवँर की ओर"हिंदी निबन्ध के रूप में,सन1998 में ही लिखी"ज़र्रा-ज़र्रा सूरज"उर्दू कहानी के रूप में लिखीं।इनके अलावा तीन भाषाओं में छपी "किरणों के पद चिन्ह" "मुसलमान का मंदिर"व"आशीर्वाद"चर्चित अन्य किताबें हैं।। उर्दू में लिखीं अन्य किताबें,"राजो-नियाज़"सन1974 में,"साज़ो-आवाज़"सन1975 में लिखीं।सन1973 में लिखी"अरमाने-दिल"मुक्तक के रूप में,सन1979में लिखी"आईने"मुक्तक के रूप में,सन1982में लिखी"मानसरोवर"हिंदी उर्दू इंग्लिश में छपी,सन1984 में लिखी"हर बार कहा दिल ने"कहानी सँग्रह के रूप में उर्दू भाषा मे छपी,सन1997 में छपी"धूप के टुकड़े"कहानी के रूप में उर्दू में छपी। आपकी एक कहानी अगस्त सन 1983 में B.B.C. लंदन पर रिकॉर्ड की गई।कहानी का नाम"लाज़बाब"है।आपने सन1983 में लंदन कवि सम्मेलन में"सदारद"की।अपने सन1984 में लखनऊ में गैर मुस्लिम उर्दू राइटर्स कॉन्फ्रेंस में भी शिरकत की।आपकी कहानियाँ औऱ काव्य 28 फरवरी सन 1981 में आकाशवाणी रामपुर से भी पड़ी गईं।आपकी दो किताबों"मानसरोवर"औऱ"हर बार कहा दिल ने"को उत्तरप्रदेश उर्दू अकाडमी औऱ बिहार उर्दू अकाडमी से पुरुस्कृत कर सम्मानित किया गया है।हाल ही में आपको "धूप के टुकड़े"औऱ चालीस वर्षों से उर्दू साहित्य में अपना योगदान देने के उपलक्ष्य इंटरनेशनल लेबिल का 9 मार्च 1999 को भारत के सर्वश्रेष्ठ उर्दू के कहानीकार के रूप में मोहम्मद रिसालुद्दीन साहिब "लंदन" के पुण्य हाथों से दिल्ली ग़ालिब एडोटोरियम माता सुंदरी लेन में आयोजित एक भव्य समारोह में मुंशी प्रेम चंद एवार्ड से सम्मानित किया गया।आपको लाइफ़टाइम एचीममेन्ट एवार्ड एवं 5100 रुपये की नक़द राशी देकर मुरादाबाद में माननीय एम पी साहब हाफ़िज़ मोहम्मद सिद्दीक़ी के हाथों सम्मानित किया गया। मुरादाबाद जिले की तहसील बिलारी का का नाम रौशन करने के लिये आपने अपनी लेखनी द्वारा जो कार्य किया औऱ उम्र भर सफ़ल चिकित्सक के रूप में समाज की सेवा की ,वो वाकई सरहानीय कार्य है।वर्ष 2015 में ब्रह्मलीम के बाद भी उनकी सेवाओँ को याद किया जाता है।स्टेशन रोड पर उनके नाम से उदय नगर कालोनी का निर्माण वर्ष 2010-11 में हुआ।जो आज विशाल रूप ले चुकी है।आप सदैव सभी परिवार के सदस्यों एवम पूरे छेत्र वासियों के दिल में अपनी जगह बनाए हुए हैं।डॉक्टर उदय सरन 'अरमान ' के सम्पूर्ण कार्यकाल को संछिप्त में लाने का एक प्रयास किया गया है।आने वाली पीड़ी के लिये वे सदैव प्रेणना स्रोत रहेंगे। लेख़क -------------- अरिनास शर्मा ,बिलारी।। ---------------------------------------- ------------------------------------------
Saturday, November 8, 2025
इंसाफ़
इंसाफ़ है ये कैसा मेरे लिये कि ख़ुशी मिले तो छड़-भर मिले औऱ दर्द मिले तो ऐसा औऱ इतना कि दर्द से भी दर्द करहा उठे हँसी भी आई होठों पर बस पल-भर के लिये ही औऱ गिरे तो आँख भर-भर गिरे न जानें समय ने कैसा है ये खेल खेला कि हाथ ख़ाली औऱ दूर कहीँ आसमाँ ज़मी से जा मिले ये खेल तो नहीँ दो खिलाड़ी का नज़र में जीते तू ही औऱ हार बस मुझे ही क्यूँ मिले मेरी ज़िंदगी कोई पल की तो नहीँ तो ज़मी मुझे बस ज़रा सी ही मिले ये कोई फ़ैसला सुकूं से भरा भी नहीँ साँस भी लिये तो गिन-गिन कर लिये है चंद दिनों का ही तो खेला फ़िर तो मैंदान में भी खिलाड़ी ज़मी पर ही गिरे क्यों आनन्द इतना तुझको आता है मुझ पर कि मेरी आँख तुझको नम ही अच्छी लगे हैं बहुत शिकायतें मेरी ज़िंदगी को तुझसे तू कहाँ है बस तेरी एक झलक तो मिले मुझे रोना बहुत है तेरी गोद मे सर रख कर तेरा हाथ मेरे सर पर तो लगे मैं उलझा रहा यूँ ही व्यर्थ की ही उलझनों में एक रस्ता ज़मी पर मुझे भी तो मिले मैं भटका नहीँ उलझ गया हूँ ख़ुद-ही में मुझे भी तो मेरी ज़िंदगी की ख़बर तो मिले मैं ज़िन्दा हूं या नहीँ भी हूँ अब फ़र्क किसे पड़ता है जब खुले आसमाँ की हवा ही न मिले-मिले तो बस दर्द के पुलनदे ढो-ढो कर मेरे अब कंधे भी थके मुझे मेरी मंज़िल का किनारा भी नज़र आता नहीँ है नज़र आ जाये तो बैठ जाऊँ अब तो शरीर भी ज़बाब दे चले कि इससे पहले बिखर जाऊँ टूट जाऊँ रेत के घर की तरह बस एक बार तू आँख में मेरी ख़ुशी की रौशनी भर दे। अरिनास शर्मा। ---------------------- -----------------------
Sunday, October 26, 2025
परदा
हँसी है तो आँसू हैं आँसू हैं तो दर्द है दर्द है तो ज़ख़्म है ज़ख़्म है तो मूरत है मूरत है षड़यंत्र हैं षड़यंत्र हैं तो परदा है परदा है तो अंत है। हर आदमी का जीवन अनादिकाल से षड्यंत्रों का शिकार होता आया है,चाहे वो षड्यंत्रकारी परिवार से हो रिश्तेदारी से हो दोस्ती से हो अधिकारी से हो जीवन तो बस वो उलझा हुआ रहस्यमयी कुआँ है कि जिसमें जितना भी झाँक लो सिवाए अंधकार के कुछ भी नज़र नहीँ आता है।आदमी का चरित्र कितना गिरता जा रहा है वो किस दिशा में जा रहा है कुछ समझ में नहीँ आता है। उपदेश देने वाले ख़ुद चरित्र से गिर चुके हैं, अध्यापक ख़ुद छात्र बने घूम रहे हैं,अध्यापक औऱ छात्र का चरित्र एक समान नज़र आता है,जीवन बचाने वाला चिकित्सक व्यापारी बन बैठा है,पुलिस अपराधी औऱ पत्रकार ब्लेकमेकर बन चुके हैं, समझ में नहीँ आता है कि कौन अभिनय कर रहा है औऱ कौन ईमानदारी से जीवन जी रहा है।मिठास सभी के अंदर इतनी भर चुकी है सभी कड़वा ही बोल रहे हैं।न क़िसी की नज़र ही सीधी है न क़िसी की ज़ुबान ही मीठी है। अजीब हालात हो गये हैं,ख़ुद को दर्पण में देख़ो तो ख़ुद का चेहरा ही झूठा सा लगता है,समझ नहीँ आता है कि जब मैं खड़ा हूँ तो दर्पण किसको दिखा रहा है।परछाईं हो या वास्तविकता जब झूठ ही नज़र आती है,अगर ये हमारा आज है तो बच्चों का कल कितना भयानक होगा।आज हम इतने दर्द को महसूस कर रहे हैं तो हमारे बच्चों के कल की खुशियाँ कहाँ से मिलेंगीं। आज के दौर में कुछ भी तो सही नहीँ है।जीवन पूरी तरह से उथल-पुथल हो चुका है।जीते जी ज़िन्दा सुखी नहीँ है औऱ बाद मरने के ज़िन्दगी नहीँ है,जाएं तो जाएं कहाँ,जियें तो जियें कैसे?अजीब कशमकश में जिंदगी ने आदमी को ला खड़ा किया है या आदमी ख़ुद ही जिम्मेदार है कुछ समझ में नहीँ आ रहा है।दोष देने वाला दोषी है या भोगने वाला दोषी है,उँगली किसकी तरफ़ उठाये,ये भी मुश्किल है। अब दिन प्रतिदिन विचारों में गिरावट आती जा रही है,व्यवहार अपराधी हो चुके हैं,जीवनदाता शत्रु बन चुके हैं,लोभ-लालच ने सभी अच्छाइयों को नष्ट कर दिया है,मानव ज़िन्दा हैं मानवता मर चुकी है,लगता है जीवन एक अंतिम अधध्याय चल रहा है।पुस्तक के अंतिम पृष्ठ की तरह जीवनरेखा भी अंतिम चरण में प्रवेश कर चुकी है।महादेव जाने आने वाला कल कैसा होगा,आज तो बस छल की ही चल रही है। अरिनास शर्मा ^^^^^^^^^^^^^^ ^^^^^^^^^^^^^^
Wednesday, October 15, 2025
युयुत्सु
युयुत्सु धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों में एकमात्र जीवित बचा था,क्योंकि धर्म के रास्ते पर चलते हुए उसने युद्ध में दुर्योधन का साथ न देकर युधिष्ठिर का साथ दिया था।कुरुक्षेत्र में युयुत्सु ने अनेकों कौरवों को मौत के घाट उतार दिया था।धृतराष्ट्र युयुत्सु से बेहद नफ़रत करता था,क्योंकि एक तो वो सौतेला भाई था औऱ धृतराष्ट्र की नाजायज़ औलाद भी था। धृतराष्ट्र के एक सेविका से अवैध सम्बन्धों का परिणाम युयुत्सु था,इसलिए भी अन्य कौरव भाई उसे अच्छी निगाह से नहीँ देखते थे।युयुत्सु भी दुर्योधन के विचारों से सहमत नहीँ था,क्योंकि वो हमेशा पांडवों भाइयों को नीचा दिखाने में लगा रहता था।दोनों के विचारों में ज़मीन-आसमान का अंतर था। कुरुक्षेत्र में युद्ध के अंतिम दिन तक सभी कौरवों की म्रत्यु हो चुकी थी।युद्ध छेत्र मानव शवों से पट गया था।हर तरफ़ सामुहिक चिताएं बनाकर दाहसंस्कार किया जा रहा था।युयुत्सु युद्ध के परिणाम के साथ महल में प्रवेश कर चुका था,परन्तु कोई भी उसके जीवित लौटने से इतना ख़ुश नहीँ था जितना दुःख अन्य की म्रत्यु का मनाया जा रहा था।परिवार की अनेक महिलाएँ तो उसे यहाँ-तक ताने मार रहीं थीं कि तू बचकर क्यों आ गया उनके साथ मर क्यों नहीँ गया। धृतराष्ट्र के म्रत्यु उपरांत पुत्र का कर्तव्य निभाते हुए युयुत्सु ने ही चिता को अग्नि दी थी।कई वर्षों तक राज करते हुए परिवार की महिलाएँ उसे जीवित रहने के औऱ युधिष्ठिर से मिलने के भीषण ताने मारते हुए उसका जीवन इतना कष्टमय बना दिया था कि एक दिन काफ़ी विचार के बाद युयुत्सु ने अपने जीवन का सबसे कठोर फ़ैसला लेते हुए आत्महत्या का निर्णय ले डाला। पृथ्वी पर उठाए क़िसी मानव द्वारा ये पहला जघन्य अपराध था।इससे पहले न क़भी क़िसी ने आत्महत्या की थी औऱ न ही ऐसा विचार क़िसी के मन में आया था।तलवारों की धार औऱ तीरों के हमलों को मात देने वाला वीर योद्धा युयुत्सु व्यंग भरे शब्दों के हमलों को सह न सका औऱ आत्महत्या कर बैठा।परन्तु उसके भाग्य में म्रत्यु के बाद भी सुख नहीँ था। प्रभु को भी युयुत्सु का ये फ़ैसला घोर अपराध लगा औऱ युयुत्सु को पृथ्वी के अंत समय तक भटकने का श्राप दे दिया।प्रभु अनुसार युयुत्सु ने निराशावान मानवों को आत्महत्या का एक ऐसा रास्ता दिखा दिया था कि अब घोर निराशा में डूबा हर मानव आत्महत्या को ही सरल समझकर ऐसा करने लगेगा।इस अपराध के लिए कोई छमा नहीँ है।तभी से समाज मे इस अपराध का भी चलन शुरू हो गया।जो घोर निंदनीय है।। आज भी हमारे समाज में आत्महत्या को अच्छा नहीँ मानते हैं, फ़िर भी आत्महत्या करने वालों की सँख्या में इजाफ़ा होता जा रहा है।निराशा से बचने का एकमात्र उपाय आत्महत्या नहीँ बल्कि जीवनसंघर्ष है।जीवन जीने के नए रास्ते खोज़ो,स्थान बदलो,उन रिश्तों से सम्बन्डविच्छेद करो जो घोर निराशा में धकेलने को मजबूर करते हैं।जीवन पुभु का दिया वो अनमोल उपहार है जो हर क़िसी के भाग्य में नहीँ होता है।जीवन जियो औऱ ऐसे सार्थक करो। प्रभु ही सत्य हैं।बाक़ी सब व्यर्थ है।। अरिनास शर्मा ------------------------- युयुत्सु की माँ का नाम आर्या था,वो वैश्य जाती की थीं। सौ कौरव पुत्र एवं एक पुत्री में 102 वें स्थान में सौतेले भाई युयुत्सु थे। --------------------------
Sunday, October 5, 2025
मैं
मैं वो क़िताब हूँ जिसको पड़ने की ज़रूरत नहीँ है क्योंकि कुछ किताबें लिखीं तो काली सिहाई से ही हैं परंतु उसमें लिखे शब्दों को समझना,उनकी समीक्षा करना बहुत ही कठिन हो जाता है,पड़ने वाला हर शब्द का अर्थ अपने जीवनकाल के कर्मों से जोड़ कर देखने लगता है और यहीं से एक ऐसा द्वंद छिड़ जाता से जो अच्छे-ख़ासे विषय को ग़लत दिशा मे ले जाकर लेख़क के विचारों को दुर्भाग्यपूर्ण दिशा मे ला खड़ा करता है,इसलिए जिसे भी आप पड़ना चाहते हैं उसको सबसे पहले जड़ से समझना बहुत ज़रूरी है।मैं कोई मनोरंजन नहीँ बल्कि एक ऐसा इतिहास हूँ जो गुज़र भी गया और जो ज़िन्दा भी है,मेरे जीवन के कड़वे घूटों से एक मयख़ाना खुल सकता है,मेरे अनुभव ख़ुशी कम देंगे आँसू से झोली भर देंगे।मुझे पड़ने के लिए दिमाग़ की नहीँ दिल की ज़रूरत पड़ेगी,मैं वो शायर नहीँ जिसकी हर बात पर वाह-वाह निकले बल्कि हर शब्द पर आह ज़रूर निकलेगी।वो समय दोषी है जिसने मुझे ऐसा बना दिया या मैं स्वम दोषी हूँ जो वक़्त के साथ चल न सका,अगर क़सूर मेरा है तो क़सूरवार वक़्त भी कम नहीँ है,जो भी शब्द मेरे पास मुझे माँ सरस्वती जी से मिले हैं उन्हीं शब्दों को पिरो कर अपनी बात खुलकर रख देता हूँ, अब या तो मेरा तरीक़ा ग़लत है या मुझे ही अभी तक शब्दों को सजाना नहीँ आया है,शायद मैं ही दोषी हूँ, परन्तु अभी मेरे जीवन के ठेर सारे पन्ने बाक़ी हैं जिन पर वक़्त की क़लम को अभी चलना बाक़ी है,जिस दिन ये जीवन की क़िताब पूर्ण हो जाएगी उस दिन वक़्त निकाल कर मुझे पड़ना ज़रूर, हाँ मैं तो नहीँ रहूँगा मग़र तुम्हारे विचारों को जानने की अभिलाषा ज़रूर रहेगी,एक दिन।। लेखक------अरिनास शर्मा। ------------------------------------ -------------------------------------
Thursday, September 18, 2025
एक विचार।
अक़्सर लोग जन्मदिन बड़े धूमधाम से मनाते हैं केक काटते हैं मोमबत्तियां बुझाते हैं दावतें उड़ाते हैं मग़र मेरी समझ में यह नहीँ आता है कि ये सब हमें करना भी चाहिये या नहीँ क्योंकि ऐसा तो है नहीँ कि भविष्य का हमें बोध नहीँ है,हम जन्मदिन की ख़ुशी मना रहे हैं या उम्र का एक वर्ष और कम हो जाने को नजरअंदाज करना चाह रहे हैं एक तरफ़ उम्र बड़ी तो दूसरी तरफ़ उम्र घटी भी तो परन्तु अक़्सर हम सच्चाइयों से मुहँ छुपाते हैं जो जीवन में कटु सत्य हैं, हमारी शिक्षा हमारे सँस्कार हमारी सभ्यता अब समाज में नज़र क्यों नहीँ आती है क्या हमने अपने-अपने दायित्यों से मुहँ मोड़ लिया है या आने वाली पीड़ी ने पारिवारिक शिक्षा को पूर्ण रूप से नकार दिया है या हम ही सही मार्गदर्शन करने में पूरी तरह असफ़ल हो चुके हैं,परिवार बिखरते जा रहे हैं रिश्ते टूटते जा रहे हैं बेटे घर से दूर जा रहे हैं बेटियाँ परिवार को त्यागने में सर्वप्रथम हैं बेटा माँ-बाप की सेवा करने में विफल है तो सँस्कारी बेटी विवाह उपराँत घर तोड़ने में लगीं हैं आख़िर हम अपने समाज को किधर ले के जा रहे हैं हमारी सभ्यता हमारी संस्कृति पश्चिमी संस्कृति के आगे कमज़ोर पड़ गई है,अब एक परिवार के अनेक परिवार नज़र आ रहे हैं सभी अलग-अलग घरों में बंद दरवाज़े के पीछे ख़ुद को प्रसन्न समझ रहे हैं वो परिवार की एकता-अखंडता को पीछे छोड़ आज अकेले-अकेले जीवन बिताने को ज्यादा अच्छा और महत्वपूर्ण समझ रहे हैं वो समझ ही नहीँ पा रहे हैं कि परिवार और प्रेम में कितनी शक्ति कितनी मधुरता है जिसे देखो वो ज्ञान का भंडार लिये घूम रहा है न सुनना चाहता है न समझना चाहता है न ही उन्हें समझाने वाले सही दिशा दिखा रहे हैं हर आदमी व्यक्तिगत लाभ कमाने के चक्कर में आने वाली पीड़ी को भटकाने का काम कर रहा है कम से कम एक समय तो ऐसा निकालो कि ख़ुद को आईने के सामने खड़े कर के ख़ुद से सवाल करो कि जो तुम्हारे फ़ैसले हैं वो सही हैं या कहीँ तुम कुछ भूल तो नहीँ कर रहे हो जिसका पछतावा तब हो जब तुम अपना सब-कुछ खो चुके हो,स्वर्ग-नरक जीवन-म्रत्यु अच्छा-बुरा धर्म-अधर्म सब बातों का ज्ञान सभी को है परंतु फ़िर भी भटका हुआ ग़लत रास्ते पर चला जा रहा है और समझने-सुनने को भी तैयार नहीँ है ये आज के युग के लोग विज्ञान को मानने वाले साँस भी लेते हैं क़भी मंदिर भी जाते हैं रात ओर दिन भी नज़र आते हैं मग़र इस सब के वजूद पर सवाल ज़रूर उठाते हैं इन्हें इन्हीं की हुई हर बात किया हुआ हर काम ही ठीक लगता है ये अपने मन में अपनी एक अलग ही दुनियाँ बना के चल रहे हैं इन्हें भटकना मंजूर है हाथ पकड़ना मंजूर नहीँ है झूठे अहंकार काल्पनिक दुनियाँ चंद पलों की खुशी और पूर्ण आज़ादी ही इनके जीवन जीने का उद्देश्य और आधार हैं न तो रिश्तों का महत्व है न परिवार का महत्व है न प्रेम की आवश्यकता है बस ऐसे लोग अपने आप में ही ख़ुश रहते हैं या इन्हें ख़ुश रहने का अभिनय करने के लिये मज़बूर किया जा रहा है परंतु दोनोँ ही कारणों में इनकी हार है जो समझाने आगे क़दम बड़ाता है उसकी सोच को नीचा बताकर अपमानित कर के चुप करा दिया जाता है ये है आज की पीड़ी,जब जाग जाओ तभी सवेरा है प्रभु करे इस पीड़ी के जीवन का सूरज भी जल्दी उदय हो इनके जीवन में भी सुख-संवर्द्धित-हर्ष आये इन्हें सही दिशा का ज्ञान हो अपनी सभ्यता-संस्कृति को अपनाते हुए आगे चलें आने वाली पीड़ी को भी सही दिशा दे पाएं इनका कल्याण हो। अरिनास शर्मा।
Thursday, August 14, 2025
काल्पनिक कथा।
जय औऱ विजय दो सगे भाई आमने-सामने ही तो रहते थे।बस घरों की दूरी इतनी थी कि बीस फिट की सड़क बीच में थी।दोनों भाइयों में बचपन में बड़ा प्रेम था,मग़र क़िसी बात पर एक दिन दोनों में मतभेद हो गये।आना-जाना बंद हो गया।एक घर के बाहर निकलता तो दूसरा घर के अंदर होता,क़भी-क़भी एक दूसरे की आवाज़ सड़क से घर के अंदर आ जाया करती थी।दिन बीतते गये त्यौहार निकलते गये,दोनोँ परिवारों के बच्चों का भी आना-जाना बंद हो गया।एक दिन बैठे-बैठे जब मैं ऊब गया औऱ मन की तन्हाई ने भी ऊब कर मुहँ फेर लिया तो याद आया कि सामने के घर में तो मेरा छोटा भाई भी रहता है,कई दिनों से उससे मिला भी नहीँ हूँ चलो आज मिलकर आता हूँ। औऱ ये सोच कर मैं जब अपने घर से बाहर आया तो पहले से ही एक बुज़ुर्ग दरवाज़े के सामने खड़ा मेरे घर को ही निहार रहा था,मेरे बाहर पहुँचते ही मेरा नाम लेकर मेरे ही बारे में पूछने लगा।मैंने बताया कि जय तो मैं ही हूँ मग़र अभी बिज़ी हूँ,उसने पूछा क्या हुआ तो मैंने बताया कि मैं सामने वाले घर में अपने भाई से मिलने जा रहा हूँ।वो बोला वो घर तो मेरा है,ऐसे कैसे हो सकता है वो घर तो मेरे छोटे भाई विजय का है,लेक़िन विजय तो मैं ही हूँ।हम दोनोँ ने एक दूसरे को गौर से देख़ा लगा चेहरा तो कुछ-कुछ पहचाना सा लगता है,मग़र ये कैसे हो सकता है मेरा छोटा भाई तो बीस साल की आयू का है औऱ इस की उम्र सत्तर-पिछत्तर की लग रही है। उसने लम्बी साँस खींची औऱ मेरे कँधे पर अपना हाथ रख कर बोला जय भैया मैं ही तुम्हारा छोटा भाई विजय हूँ।हम दोनोँ की आँखे नम हो चलीं थीं, बस ये पता नहीँ कि ये आँसू ग़म के थे या ख़ुशी के थे।इतने वर्ष हो गये हमको मिले-बात कर हुये कि हम-दोनोँ ही इतने बूड़े हो चुके थे कि एक-दूसरे को पहचान भी नहीँ पा रहे थे।शायद बहुत देर कर दी ये फ़ैसला लेने में कि पहले कौन आकर मिलेगा।हम -दोनोँ एक-दूसरे से गले लग कर पछतावे के आँसुओ से अपनी हठ को धोने में लगे थे तभी एक अधेड़ व्यक्ति एक बच्चे को गोद में लिये विजय के घर से निकला औऱ विजय के पास आकर खड़ा हो गया।विजय ने उससे कहा बेटा अमर इनके पैर छू कर आषीर्वाद ले लो ये तुम्हारे ताऊजी हैं।मैंने पूछा ये कौन है?अरे ये मेरा बेटा है जो तेरे ही घर में पड़ा रहता था औऱ इसकी गोद में इसका बेटा है यानी हमारा पोता है।मैंने दोनोँ के सर पर हाथ रख दिया। हम दोनोँ का गला भर आया था बोलने को शब्द नहीँ थे।मैं ये सोच कर घर के अंदर आया कि आज आईना गौर से देखूँगा कि मैं कैसा लगता हूँ,मैं ज़िन्दा हूँ या मर गया हूँ।। लेखक ------------- अरिनास शर्मा """"""""""""""""""""""""""
Sunday, July 20, 2025
एक सवांद।
लेख़क की क़लम से निकले कहानी के सभी पात्र काल्पनिक होते हैं।कुछ पात्र स्वम् को सर्वश्रेष्ठ मानकर अहंकार रूपी व्यवहार करने लगते हैं,परन्तु वो ये भूल जाते हैं कि उन्हें गड़ने वाला केवल लेख़क होता है,औऱ उन्हें ख्याति दिलाने वाला वो पाठक होता है जो उन्हें बार-बार पड़ता है।किसी भी पात्र की भूमिका लेख़क के क़लम से निकली कल्पना मात्र ही होती है।पात्र हीरो हो या विलन वो फ़िल्मी पर्दे पर रचा गया हो या वास्तविक जीवन में,स्वयं का कुछ नहीँ होता है।कहानी के काल्पनिक पात्रों की तरह हम-सभी पृथ्वी पर जीवत मानव जाति हो या पशु-पक्षी हों या जल में विचरने वाले जीव हों,सभी प्रभु की रची रचना का मात्र एक हिस्सा हैं।हम वही करते हैं जो प्रभु ने हमारे अंदर कहानी का समावेश किया है।बात की हो या युगों पहले की घटित घटनाएं ही क्यों न हों।सभी पहले से ही तय हो चुका होता है।द्रोपती का चीर हरण कराने वाला दुर्योधन दुष्ट था या माँ सीता का अपहरण करने वाला रावण क्रूर था,परन्तु प्रश्न यह भी उठता है कि जब धृतराष्ट्र की सभा में भीष्मपितामह औऱ अनेकों धर्मगुरु विराजमान थे तो दुर्योधन इतना बड़ा दुस्साहस कैसे कर पाया,क्या मौन रहने वाले भी पाप के भागीदारी नहीँ बने औऱ यदि बने तो उनको क्या दंड मिला,रावण तो स्वम् शिवजी का सबसे बड़ा भक्त था तो उसने ये अपराध कैसे किया,क्यों सभी देवता मौन होकर देखते रहे,परन्तु ये भी सत्य है कि सभी को अपने-अपने अपराधों की क़ीमत चुकानी पड़ी थी।ऐसा नहीँ था कि केवल दुर्योधन औऱ रावण को ही दंड मिला।क़िसी ने अपना कुल का विनाश होते देख़ा तो क़िसी ने अपने पुण्य को नष्ट होते देख़ा,आँसू तो प्रत्येक की आँखों से गिरे,क़िसी के आँसू विजय की ख़ुशी के थे तो क़िसी के आँसू ग़म औऱ दर्द के थे कोई आँसू पोंछ रहा था तो कोई आँसू छुपा रहा था।सब ने अपना-अपना कर्म किया औऱ सभी को अपने कर्मो के परिणाम स्वरूप दंड भोगना पड़ा।तो ये अवश्य याद ऱखना चाहे तुम कहानी से उपजे हीरो हो या प्रभु के बनाये जीवित मानव तुम मात्र एक कल्पना हो,प्रभु की कल्पना।अहंकार, ईर्ष्या,क्रोध को दूर कर प्रेम की भाषा बोलो,प्रेम से रहना सीखो,भेद-भाव भुलाकर एक-दूसरे के सुख-दुःख के भागीदार बनो।तुम्हारे करनी-कथनी में कोई फ़र्क नहीँ होना चाहिए।अच्छा सोचोगे,अच्छा करोगे तो प्रभु के स्नेह के पात्र बन कर स्वयं के जीवन को धन्य कर लो।लोभ-लालच,छल-कपट केवल कष्ट की राह पर ही लाकर ही खड़ा कर देते हैं, वहाँ न अपनों का ही साथ होता है औऱ न ही प्रभु की दया के पात्र बन पाते हैं, भले ही तुम प्रभु की कल्पना हो परन्तु सार्थक जीवन जीकर स्वम् को मोक्ष अवश्य दिला सकते हो। नेक बनो-एक बनो। लेख़क। ------------------- अरिनास शर्मा --------------------------------- ----------------------------------
Wednesday, July 16, 2025
पटकथा
एक नया दिन औऱ फ़िर वही पुराना क्लेश एक गरीब परिवार की शुरूबात,पिता महेश चंद,"कर्ज़ा करके तुझे पड़ाया औऱ तू आवाराओं की तरह घूमता-फिरता है कोई नोकरी क्यों नहीँ करता है?कब-तक हम पर बोझ बना रहेगा?"माँ,"बिचारा कोशिश तो कर रहा है अब काम नहीँ मिल रहा है तो ये क्या करे।" "तुम्हीं ने इसका दिमाग खराब कर रखा है तुम लोगों ने मेरा जीना हराम कर दिया है।"महेश चंद गुस्से से कहते हुए बाहर चले गये।अमर भी गुस्से में बाहर की ओर चला गया।"खाना तो खा जा बेटा।"माँ कहती रह गई। रोज-रोज के तानों से तंग आकर अमर अपनी साइकिल पर सवार होकर चल दिया।आज अमर मन ही मन अपनी किस्मत को कोसते हुए बेहद गुस्से में घर से निकला था।गाँव से थोड़ा दूर आकर अचानक गाँव के ही एक अधेड़ व्यक्ति ने बीच सड़क पर खड़े होकर उसका रास्ता रोकते हुए ताना मारा,"क्यों बे निकम्मे आज कहाँ चला आवारागर्दी करने।" सामने से हठ जा ताऊ मेरा वैसे ही दिमाग खराब है।" "तो क्या कर लेगा मेरा तू भोसड़ी के बदमाशी दिखा रहा है मुझे साले इतना मारूँगा की सारी हेकड़ी निकल जायेगी,समझा।"उस आदमी के मुंह से निकली गालियों ने आग में घी डालने का काम कर दिया।अब अमर के गुस्से का ठिकाना नहीँ रहा।उसने साइकिल स्टैंड पर खड़ी की औऱ पास में पड़े एक डंडे को उठा कर जोर से उस आदमी के सर पर दो-तीन वार कर दिये।आदमी वहीँ ढेर हो गया।अमर डंडा लेकर घर वापस आया औऱ अपने बेड के पीछे छुपा कर चला गया। गुस्से में ही सही मग़र अमर से एक अपराध तो हो चुका था।अब वो औऱ गुस्से में था साथ ही उसे अपराध बोध भी हो रहा था।काश वो अपने गुस्से पर काबू कर लेता तो ये सब नहीँ होता।वो अपने खेत पर जाकर बैठ गया औऱ सोचने लगा कि अब क्या करूँ?उधर गाँव मे उस आदमी की हत्त्या की खबर आग की तरह फैल चुकी थी।गाँव मे पुलिस भी पहुँच चुकि थी।परंतु ये किसी को भी नहीँ पता था कि इसे मारा किसने है?क्योंकि वारदात के समय इत्तेफाक से तीसरा कोई औऱ वहाँ था ही नहीँ।पुलिस बॉडी पोस्टमार्टम के लिए साथ ले गई। काफ़ी देर बाद अमर घर आया।उसके पिता भी आ चुके थे।माँ ने दोनों को खाना परोसा दिया।खाना खाते हुए,"आज गाँव के बाहर किसी ने प्रधान के भाई के खून कर दिया,पुलिस बॉडी ले गई,पता नहीँ किसने औऱ क्यों मार दिया?" "हाँ शोर तो बहुत हो रहा था,इनके दुश्मन भी तो बहुत हैं,जब देख़ो प्रधानी की धोंस में किसी को भी गाली बक देते हैं किसी की पिटाई कर देते हैं इनके साथ तो ऐसा ही होना चाहिए था।"माँ बोली।अमर दोनों की बातें चुपचाप सुनता रहा,खाना खा कर वो बाहर चारपाई पर जा कर लेट गया।घर के क्लेश गुस्से औऱ नोकरी न मिलने की कुंठा में ये सब हो गया।परन्तु अब बहुत देर हो चुकी थी।। उधर प्रधान ने अज्ञात के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाई औऱ पुलिस पर दवाब भी बनाया की जल्द से जल्द हत्त्यारे को पकड़े।पुलिस छानबीन में जुटी थी मगर कोई सफलता हाथ नहीँ लग रही थी।न मडर करने वाला हाथ आ रहा था औऱ न ही जिससे मडर हुआ वो हथियार ही मिला था।ऊपर से प्रेशर पड़ रहा था।अब पुलिस कमिश्नर ने प्लान बनाया की किसी मुजरिम को पकड़कर प्रधान के भाई के खूनी के रूप मे कोर्ट में पेश कर के फाइल बंद करते हैं अपनी जान छुड़ाते हैं।एक टीम बनाकर काम पर लगा दिया जाता है। अगले दिन अपने कुछ दोस्तों के साथ अमर गांव के मंदिर के बाहर बैठा था तभी एक आदमी आया औऱ बताने लगा कि पुलिस ने वो हथियार बरामद कर लिया है जिससे हत्त्या हुई थी अब खूनी भी जल्दी पकड़ा जाएगा।अमर तुरंत उठ कर घर जाता है औऱ बेड के पीछे देखता है कि उसका छुपाया डंडा तो अब भी वहीँ पर है।वो समझ जाता है कि पुलिस खुद को बचाने के लिए किसी बेगुनाह की बलि चड़ाने वाली है।अब उसे लगता है कि उसके चक्कर मे एक औऱ बेगुनाह मारा जाएगा।पुलिस ईमानदारी से अपना फर्ज नहीँ निभा रही थी।काफी सोच विचार के बाद अमर सारी घटना अपने माँ-बाप को बता देता है।वो कहता है कि अब वो समर्पण कर देगा।माँ-बाप बेहद दुखी होते हैं औऱ रोने लगते हैं, उनका इकलौता बेटा क्लेश के चक्कर मे कैसे मुसीबत में फंस गया।मगर अब देर हो चुकी थी। अगली सुबह अमर खुद थाने पहुँच कर समर्पण कर देता है औऱ अपना गुनाह कबूल कर लेता है।पुलिस हैरान भी है औऱ ख़ुश भी थी कि आखिरकार खूनी खुद ही आ गया।अब पुलिस फ़ाइल तैयार कर अमर को कोर्ट में पेश करती है।पुलिस अपनी वाहवाही के लिए झूठे गवाह झूठा हथियार कोर्ट में पेश करती है।सरकारी वकील पुलिस की तरफ से बहस करता है औऱ झूठे गवाह पेश करता है।अमर खामोशी से सब देख व सुन रहा है।कोर्ट में प्रधान व गांव के अन्य लोग भी मौजूद हैं।अमर के माता-पिता भी बैठे हैं। सरकारी वकील औऱ पुलिस झूठे गवाह पेश करते रहे बहस चलती रही,अंत मे जज साहब ने अमर से पूछा,"तुम्हें अपनी सफाई में कुछ कहना है।"अमर मुस्कुराया।जज साहब,"तुम पर मडर का केस चल रहा है औऱ तुम्हें हँसी आ रही है,इससे पहले मैं सजा सुनाऊ कुछ मन में हो तो बोल दो।" अमर,"मैं कोर्ट से माफी चाहता हूँ परन्तु हँसी मुझे सरकारी वकील साहब औऱ पुलिस पर आ रही है।" "क्या मतलब?"जज साहब बोले।अमर,"मैं कोर्ट को सच से अवगत कराना चाहता हूँ, कि न तो पुलिस ने मुझे गिरफ़्तार किया है औऱ न ही ये सभी गवाह असली हैं औऱ न ही ये वो हथियार है जिससे मैंने हमला किया था।अभी तक कोर्ट में जो कुछ भी पेश किया गया वो सब झूठ औऱ कोर्ट को गुमराह करने की कोशिश थी।असल मे पुलिस पूरी तरह नाकाम औऱ असफल रही है।" "ये तुम कैसे कह सकते हो?"वकील साहब टोकते हैं।अमर"कत्ल मेरे द्वारा हुआ है तो सच भी मैं ही जनता हूँ औऱ ये कोई सोची-समझी साजिश नहीँ बस दुर्घटना मात्र थी।" "साफ-साफ कहो जो कहना है"जज साहब।अमर विस्तार से बताता है,"जज साहब मैंने वकालत की डिग्री हॉसिल की है,मग़र अभी तक मुझे न तो नोकरी मिली न ही मैं अलग से काम शुरू कर पाया हूँ।मैं बेहद गरीब परिवार से हूँ।आये दिन मेरे खाली रहने की वजह से घर मे क्लेश होता आया है।जिस दिन ये घटना हुई उस दिन भी में पिता की डांट औऱ ताने सुनकर गुस्से से बाहर निकला था।प्रधान जी का भाई पहले से ही बीच सड़क पर खड़ा था मैंने बचने को कहा तो उसने भी गालियों की बौछार कर दी औऱ ताने देने लगा।मैं पहले से ही गुस्से में था इसने मेरा गुस्सा औऱ भड़का दिया,मैंने वहीँ पास में पड़े एक डंडे से उसके सर पर वार कर दिया।उसने घटनास्थल पर ही दम तोड़ दिया।वो डंडा मैंने अपने बेड के पीछे छुपा दिया जो अब भी वहाँ है औऱ उस पर खून के निशान भी हैं,लेकिन जब मुझे पता चला कि पुलिस अपनी नाकामी छुपाने के लिए औऱ झूठी वाह वाही लूटने के लिए किसी बेगुनाह को फंसाने की तैयारी कर रही है तो मुझसे बर्दाश नहीँ हुआ।मैंने सबसे पहले अपने माता;पिता को सब बताया जिससे वो भी अनजान थे फिर में खुद थाने पहुँचा औऱ पुलिस को घटना से अवगत कराया औऱ समर्पण कर दिया।मैं चाहता तो पुलिस तो क्या किसी को भी खबर नहीँ होती मग़र मेरे जमीर ने गवाही नहीँ दी।मैं चाहता हूँ कि मेरे बेड के पीछे रखे डंडे को मंगाया जाये उस पर लगे खून के निशान की जांच कराई जाए,सच सबके सामने आ जायेगा,ये पुलिस गवाह औऱ वकील सब झूठे हैं।इनके खिलाफ भी कानूनी कार्यवाही की जाए।मैं न आता तो किसी बेगुनाह को फाँसी पर चड़ा देते।जो कुछ भी हुआ उसका मुझे बेहद अफसोस है,बस मुझे औऱ कुछ नही कहना है।" कुछ पल के लिये कोर्ट में सन्नाटा छा गया।एक लंबी सांस लेते हुए जज साहब ने अपना फैसला सुनाया,"ये कोर्ट पुलिस की साजिश औऱ नाकामी के लिए सस्पेंड करती है साथ ही पुलिस कमिश्नर को भी सस्पेंड किया जाता है।साथ ही मुजरिम के घर से डंडा बरामद करके जांच के लिए भेजा जाए,वकील साहब की डिग्री निरस्त की जाती है साथ ही इनके खिलाफ भी कोर्ट अपना फैसला सुनाएगी।वो भी गवाह के तौर पर पेश हुए हैं उन्हें तीन-तीन साल की सजा औऱ पचास-पचास हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाती है।मुजरिम ने जुर्म तो किया है मगर किसी साजिश के तहत नहीँ बल्कि एक दुर्घटना वश उठाया गया कदम माना जाता है।परंतु जिस सच्चाई से समर्पण किया औऱ कोर्ट को सच्चाई से अवगत कराया है वो भी प्रशंशनिये है।ये अदालत मुजरिम को दस साल की कैद औऱ पांच लाख रुपये जुर्माना भरने की सजा सुनाती है,रुपये न जमा कराने की स्तिथि में दो साल की कैद औऱ बड़ा दी जाएगी।कोर्ट बर्खास्त की जाती है।" यही कहानी का अंत है।यह कहानी काल्पनिक है,इसका किसी भी घटना से कोई सम्बन्ध नहीँ है।। लेख़क। -------------- अरिनास शर्मा --------------------------- -----------------------------
Friday, July 11, 2025
अ----ज्ञानी
ये बात एक ऐसे घर की है,जहाँ सभी बैठे हँसी-ठिठोले कर रहे थे,कि अचानक बात-बात में एक ऐसी बहस छिड़ गई जिसकी क़िसी को भी उम्मीद नहीँ थी।बात शुरू हो गई यूट्यूब-गुगल के ज्ञान की।जिसने शुरूबात की वो सज्जन बेहद यूट्यूब-गुगल प्रेमी थे।दूसरे सज्जन सनातन धर्म औऱ अपने वेद-पुराणों में विशवास रखने वाले थे। अब मोबाइल प्रेमी अपने यूट्यूब ज्ञान के आगे सभी बातों को काटे जा रहे थे या यूँ कहें कि ख़ुद को सर्वश्रेष्ठ-सर्वज्ञानी साबित करने पर तुले थे।तो फ़ैसला ये हुआ कि धर्म से जुड़े सज्जन ने प्रस्ताव ऱखा कि यदि तुम मेरे कुछ सवालों के जवाब दो तो तर्क शुरू होगा।यदि लगे कि तुम ग़लत हो तो शांत हो जाना।गुगल प्रेमी तैयार हो गये,तो पहला सवाल आया कि,गूगल का निर्माण किसने किया औऱ इसमें समलित जानकारियां कहाँ से आईं?"जवाब आया"आदमी के द्वारा।"दूसरा सवाल"यूट्यूब का निर्माण औऱ जानकारियां कहाँ से आईं।"जवाब आया"आदमी के द्वारा।"तीसरा सवाल"आदमी के पास इतना दिमाग़ इतने सवालों के जवाब कहाँ से आये।"जवाब आया"कालेज की किताबों से"चौथा व अंतिम सवाल"वो किताबें किसने लिखीं जिनको पड़कर दूसरा आदमी इतना क़ाबिल बन गया।"जवाब आया"वो भी आदमी ने लिखीं"ठीक है।ये निचोड़ तो निकला यूट्यूब औऱ गूगल बाबा के ज्ञान के रास्ते का। अब आते हैं सनातनी ज्ञान की क़िताबों की ओर, तो पहला सवाल"हमारे ग्रँथ, वेद-पुराण, धार्मिक किताबें किसने लिखीं"?जवाब आया"ऋषी-मुनियों ने"दूसरा सवाल"श्री रामायण, भगवत गीता,शिव-पुराण, गरुड़-पुराण, भविष्य-पुराण, गरुण-कथा,सभी देवी-देवताओं के चालीसा-आरतियाँ किसने लिखीं?"जवाब आया"ऋषी-मुनियों औऱ आचार्यों ने।"ठीक है।। अब तुम्हारी जानकारी के लिये ये भी बताता चलूं कि एक तरफ़ एक साधारण आदमी ने स्कूली पड़ाई कर के जो ज्ञान हॉसिल किया वो सही औऱ अकाट्य सत्य है या दूसरी तरफ़ इन ऋषी-मुनियों ने घोर तपस्या कर के जो ज्ञान हॉसिल किया,जिन महान विभूतियों ने बड़े-बड़े गुरुकुल में ज्ञान प्राप्त करके जो हॉसिल किया वो सत्य है।" ज़रा गम्भीरता से विचार करो फ़िर सनातन धर्म-सनातन ज्ञान पर उंगली उठाओ।यूँ ही हर बात पर गूगल खोलकर बैठ जाते हो,यूट्यूब पर खोजने लगते हो औऱ फ़िर सामने वाले को नीचा दिखाने की ठान लेते हो,इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि तुम से बड़ा मूर्ख-तुम से बड़ा अज्ञानी कोई औऱ नहीँ है।दूसरे को नीचा दिखाना महानता नहीँ है बल्कि आधे ज्ञान के साथ प्रवचन देना औऱ उस अधूरे ज्ञान को सत्य साबित करना बहुत ही घातक औऱ मूर्खता है। सही ज्ञान प्राप्त करना है तो मोबाइल पड़ना छोड़ो औऱ अच्छी किताबें पड़ने की आदत डालो।घर बैठे अच्छी-अच्छी किताबें डाक द्वारा मंगाओ औऱ अधूरे ज्ञान औऱ वाहियात वीडयो देखने की वजह अपने घर मे एक छोटी लायब्रेरी का निमार्ण करो।बच्चों को भी किताबें पड़ने की आदत डलवाओ औऱ मोबाइल की लत छुड़वा दो,तभी तुम्हें भी सही ज्ञान की प्राप्ति होगी औऱ तुम्हारा आने वाला कल भी सुरक्षित होगा।। एक विचार। लेख़क। अरिनास शर्मा ।। --------------------------- ----------------------------
Sunday, July 6, 2025
नाईट डयूटी
बिजय ने रिटायर होने की उम्र में एक मॉल के पार्किंग में वॉचमैन की नाईट डयूटी कर ली है,वो बच्चों पर निर्भर न रह कर इस उम्र में भी कुछ काम करते रहना चाहता है।विजय घर से लंच बॉक्स ले कर काम पर निकल जाता है। दूसरी तरफ़ शहर का नामी बदमाश रणवीर अपने साथियों के साथ मिलकर बड़ी डकैती का प्लान कर रहा है।असल मे जिस पार्किंग में विजय वॉचमैन की जॉब करता है,उसी के बेसमेंट में मालिकों की एक बड़ी तिज़ोरी है,जिसमें सौ करोड़ कैश औऱ डायमंड रखे हैं।जब से यह जानकारी रणवीर को लगी है वो इसे उड़ाने की प्लांनिग कर रहा है। विजय जब डयूटी पर पहुँचता है तो अंजली पार्किंग में पहुँच चुकि होती है।आज वियय औऱ अंजली की ड्यूटी लगी है।अंजली तलाक़ शुदा है।विजय औऱ अंजली के पास अपनी प्राइवेट पिस्टल है।दोनों सभी गेट चैक करते हैं।सभी को लॉक कर के अपने सर्विस रूम में आकर टी वी पर चैक करते हैं। अंजली"चलो अब लंच कर लेते हैं।"विजय अपने बैग से टिफ़िन निकाल कर मेज़ पर रख़ता है।अंजली"आज क्या बनाकर लाये हो।"असल में विजय की पत्नी का देहांत हो चुका है औऱ वो अकेला ही रहता है।विजय"वही पुरानी आसान डिश खिचड़ी"अंजली"हँसते हुए लो आज तुम मेरा खाना खा कर देख़ो औऱ मैं तुम्हारी डिश चखती हूँ।"तभी गेट पर आवाज़ होती है।दोनों चोंक जाते हैं।विजय"मैं देखकर आता हूँ तुम स्क्रीन पर नज़र रखो।" विजय गेट पर पहुँचता है तो वहाँ कुछ गाड़ियां औऱ लोगो को देखता है।एक आदमी चैनल के पास आकर विजय से गेट खोलने को कहता है।विजय कहता है कि रात में गेट खोलने की परमीशन नहीँ है।तभी वो आदमी चैनल का ताला तोड़ने की कोशिश करने लगता है।विजय उन्हें सावधान करता है।विजय अपने बॉस को काल करके बताता है।बाहर तूफ़ानी बारिश आई है।बॉस बताता है कि बैकप भेजने में देरी हो जाएगी तुम जब तक सम्भालो।तूफ़ानी बारिश के कारण पुलिस भी जल्दी नहीँ पहुँच सकती है।। तिज़ोरी की जिम्मेदारी विजय औऱ अंजली पर आ जाती है।बदमाश क़िसी तरह ताले तोड़ कर अंदर पहुँच जाते हैं।अब बदमाशों औऱ विजय-अंजली के बीच लंबी जंग छिड़ जाती है।विजय औऱ अंजली दोनों बुरी तरह घायल हो जाते हैं लेकिन तिज़ोरी लूटने नहीँ देते हैं।रात भर लुका-छुपी औऱ घमासान लड़ाई होती है। सुबह होते-होते सभी बदमाश मारे जाते हैं।जब तक पुलिस आती है तब तक सब तरफ़ शांति हो जाती है।पुलिस चीफ़ दोनोँ की बहादुरी के लिए शाबासी देता है।विजय औऱ अंजली इस लड़ाई में एक दूसरे के करीब आ जाते हैं।दोनोँ अब एक साथ रहने लगते हैं। यही कहानी का अंत है।। कहानी के पात्र व घटना काल्पनिक है।इसका क़िसी घटना या स्थान से कोई सम्बन्ध नहीँ है।। लेख़क। अरिनास शर्मा ।
Monday, April 28, 2025
पहलगाम
पहलगाम की सुंदर घाटी सैलानियों से भरी अपने सौन्दर्यता को दर्शाती औऱ दूर-दूर से आये सैलानियों के मन मोहती सब के ह्रदय में अपार ख़ुशी भरती हुई अपने पूरे यौवन पर इतराती हुई हँसे जा रही थी कि दूर क़िसी शैतान प्रवति के अनेक आतंकवादियों को चुभ रही थी।ख़ुशी के कुछ पल बीते ही थे कि अचानक काले बादलों का अर्थात शैतानों का आगवन हो गया।लोगों का धर्म पूछ-पूछ कर गोलियां मारनी शुरू कर दीं, देखते ही देखते हँसी-ख़ुशी की जगह चीख़-पुकार मच गई,आसमान भी ये देखकर हैरान हो गया कि जहाँ कुछ पल पहले वादी में रौनक ही रौनक थी अब जगह-जगह लाशें बिख़री पड़ी थीं।एक नव बधू अपने पति की लाश के सिरहाने बैठी न जाने कहाँ खो गई थी,कोई अपने पति को तो कोई अपने पिता को तो कोई अपने बेटे की लाश को बेसुध निहारे जा रहा था।हर तरफ अफरा-तफ़री का माहौल था,हाल ये था कि आतंकवादी तो अपना मक़सद पूरा कर के भाग गये थे,अब जो भारत के सैनिक बचाने आये थे उन्हें देखकर सैलानी रोने औऱ जान की भीख माँगने लगे थे,औऱ सैनिक उन्हें भरोसा दिला रहे थे कि वो भरतीय सैनिक हैं उन्हें बचाने आये हैं।हुआ ये था कि आतंकवादी भी सेना की ड्रैस पहनकर आये थे,इस लिए उन्हें देखकर सभी औऱ ज्यादा घबरा गए थे।देखते ही देखते पूरा देश सकते में आ गया,क़िसी ने भी ऐसी भीभत्स घटना की कल्पना भी नही की थी।पूरा देश दर्द औऱ क्रोध से भर गया।जल्द ही पूरी दुनियाँ इस हमले से अवगत हो चुकि थी।सभी आश्चर्यचकित थे कि पाकिस्तानी आतंकवादियों ने ये क्या कर दिया।पूरी दुनियाँ पाकिस्तान के ख़िलाफ़ एक सुर में खड़ी हो गई,औऱ अब सभी की ज़ुबान पर एक ही बात थी,बदला।आज पूरा देश पूरी दुनियाँ सिर्फ़ इस इंतज़ार में बैठी है कि भारत कब औऱ कैसे बदला लेता है।अब बहुत हो चुका है।हमने अपने बहुत से सैनिक बहुत से नागरिक इन आतंकीयों द्वारा मरते हुए देखे हैं औऱ निरन्तर ऐसा हो रहा है।हर बार सरकार अस्वासन देकर या छोटी-मोटी कार्यवाह कर के शांत कर देती थी।अब हमें इन दुशमन से अंतिम युद्ध करना है।जब-तक ये दुश्मन मिट्टी में नहीँ मिला दिए जाते,क़िसी को चैन नहीँ आयेगा।अब ये भारत की नहीँ बल्कि पूरी दुनियाँ की आवाज़ है।मोदी जी को कठोर से कठोर कदम उठाना ही पड़ेगा।बस हमे इंतज़ार है उस दिन का जब देश का बदला पूरा होगा। अरिनास शर्मा,बिलारी। 29-4-2025
Saturday, March 15, 2025
जीवन-कहानी
हम बच्चों को क्या कहानी सुनाए,असल में जीवन ख़ुद में एक कहानी है।हम कहाँ जन्में हैं,किस माहौल में हमारी परवरिश हो रही है,कैसा वातावरण है,परिवार के लोग कैसे हैं,उनका चरित्र कैसा है,वो हमें कैसे संस्कार दे रहे हैं,हमारे दोस्त कैसे हैं।। बचपन से अंत तक का सफ़ऱ औऱ उस सफ़ऱ के पड़ाव हमारे कर्म हमारी भाषा हमारी नज़र हमारी नियत,जीवन में कुछ भी तो भिन्न नहीँ है।जैसे-जैसे जीवन में हम आगे बड़ते हैं वैसे-वैसे हमारे बचनों के आधार पर हमारे कर्मों के आधार पर हमारे जीवन की कहानी आगे बड़ती रहती है। अब प्रकृति की गोद में हमें रहने का जो सौभाग्य प्राप्त हुआ है उसमें हम ख़ुद के स्वरूप को जितनी अच्छी तरह से उजागर कर के सबके सामने प्रस्तुत करें उतना ही हमारे जीवन का हर अध्याय का हर पन्ना एक नया इतिहास लिखेगा।हम अपने चरित्र को जैसे चाहे वैसे प्रस्तुत कर सकते हैं,परन्तु हम अक़्सर भटक जाते हैं। जीवन मरण की असल कहानी हमारे जिये प्रतिदिन के किये हमारे द्वारा कार्यों में ही निहित है।हमारा जीवन स्वम् एक कहानी है,क़िसी औऱ की कहानी पड़ने से अच्छा है कि हम अपने चरित्र को इतना सुंदर बनाएं कि औऱ लोग हमें पड़ें,हमें समझें,हमें जानें।हम अपनी जीवनी को एक सुंदर कहानी बनाकर समाज में एक मिसाल प्रस्तुत करें। अरिनास शर्मा,बिलारी।
Saturday, March 8, 2025
युद्ध-विराम
जय-सिमरन की आज शादी की पहली रात गुज़री है औऱ सुबह सिमरन का बुलावा आ गया,असल मे सिमरन फ़ौज में सैनिक है औऱ उसका पति सरकारी टीचर है।दोनों की अरेंज मैरिज है।अब चूकि फ़ौज की नोकरी है तो जाना तो पड़ेगा ही।सिमरन घर वालों से मिलकर अपनी ड्यूटी पर पहुँच जाती है।कमांडर दस सैनिकों को जो कि फ़ोर्स के सबसे जांबाज सैनिक हैं उन्हें एक गुप्त मिशन पर भेजने की तैयारी करता है।सिमरन के साथ ट्रेनिग लिये अन्य साथी जिनमें विजय,करण,अभय,जीत,सरदार अमरजीत,सुरेंद्र,भानू,प्रिया,काजल बैठे हँसी-मज़ाक करते हुए अपनी छुट्टियों के बारे में बताते हैं। विजय जनता है कि सिमरन की अभी-अभी शादी हुई है बाबजूद इसके वो अपने पहले प्यार सिमरन की ओर आकर्षित रहता है।सिमरन भी जानती है कि विजय उससे प्यार करता है पर अब उसकी शादी हो चुकि है तो वो उसे नजरअंदाज करने की कोशिश करती रहती है।पाकिस्तान बॉडर पर कुछ ख़तरनाक आतंकवादी छुपे होने की सूचना मिलती है।फ़ौज ख़ुफ़िया तरीक़े से उन्हें उनके अंजाम तक पहुँचाना चाहती है साथ ही कोशिश होती है कि कोई भी नागरिक इस ऑपरेशन की चपेट में न आये।कमांडर टुकड़ी को रवाना कर देता है।अन्य अधिकारी कंट्रोर रूम से उनसे सम्पर्क बनाये ऱखते हैं। आतंकवादियों को भी इस होने वाले हमले की भनक लग जाती है।वो भी अपना जाल बिछा देते हैं।कमांडर लोकल पुलिस को अपने गुप्त मिशन की जानकारी देते हुए उन्हें सतर्क कर देता है औऱ फौजियों का सहयोग करने का ऑर्डर देता है।लोकल पुलिस औऱ सारे फ़ौजी पूरे इलाके को घेर लेते हैं।दोनों तरफ से हमला शुरू हो जाता है,कई आतंकी मारे जाते हैं कुछ पुलिस वाले भी घायल होते हैं, मग़र आतंकी सिमरन औऱ विजय को घेर कर पकड़ लेते हैं औऱ अपने साथ ले जाते हैं।मिशन पूरी तरह क़ामयाब नहीँ हुआ औऱ दो फ़ौजी भी उनकी गिरफ़्त में आ जाते हैं, आतंकी उन्हें बॉडर पार पाकिस्तान के अपने अड्डे पर ले जाकर कैद कर लेते हैं। इधर कमांडर अपने बचे फ़ौजियों के साथ एक नई टुकड़ी को बनाकर सिमरन औऱ विजय को बॉडर पार से लाने की योजना बनाते हैं।सिमरन के घर वाले भी इस खबर से परेशान हैं।उधर आतंकी दोनों को टॉर्चर करते हैं।सिमरन विजय से कहती है कि वो अब ज़िन्दा नहीँ बचेंगे मग़र विजय कहता है कि जब तक वो ज़िन्दा है तब तक वो कोई न कोई तरीका जरूर निकाल लेगा।विजय कोशिश करके अपनी रस्सियों को खोल लेता है फ़िर आतंकी के आने से पहले सिमरन को ले कर वहाँ से बचता हुआ जँगल में छुप जाता है।जाते-जाते वो दोनों वहाँ से उनके कुछ गन ले लेते हैं। भूखे होने के कारण विजय कुछ खाने के लिए जंगली फल ले आता है।उधर कैम्प में जब दोनों नहीँ मिलते हैं तो आतंकी उन्हें तलाशने टुकड़ो में बट जाते हैं।विजय औऱ सिमरन एक गुफ़ा में छुप जाते हैं।तेज़ बारिश होने लगती है।सिमरन ठंड से काँपने लगती है।विजय अपनी जैकिट उसे पहना देता है औऱ ख़ुद गन लेकर पहरा देने लगता है।सिमरन जब ठंड से सुकड़ कर बैठे विजय को देखती हो तो वो उससे चिपट कर बैठ जाती है।विजय उसकी तरफ देखता है तो सिमरन मुस्कुरा देती है।दोनों एक दूसरे के बेहद करीब आ जाते हैं औऱ उस रात एक दूसरे के हो जाते हैं।दोनों प्यार में इस क़दर खो जाते हैं कि उन्हें पता ही नही चलता है कि आतंकी उनको खोजते हुए कितने करीब आ जाते हैं। दोनों तरफ से फ़ायरिंफ होती है,एक गोली विजय के हाथ मे लग जाती है पर किसी तरह वो दोनों वहाँ से बच निकलते हैं।दूसरी तरफ कमांडर अपने फ़ौजियों को बचाने के लिए नई टुकड़ी भेज देता है।विजय औऱ सिमरन बचते हुए भारत बॉडर की तरफ भागते हैं, एक गोली फिर से उसके पैर में लगती है औऱ वो गिर जाता है,सिमरन अपनी गन से दुश्मनों पर गोलियों की बौछार कर देती है,ऊपर से भारतीये सैनिक हवाई हमला बोल देते हैं।आतंकी ढेर हो जाते हैं।सिमरन विजय को सहारा देखा बॉडर पार ले आती है।अपने साथियों से मिल कर ख़ुशी से रोने लगते हैं, मग़र खतरा अभी टला नहीँ था पाकिस्तानी फौजी आ धमकते हैं मगर वो भारत के सिपाहियों से परिचित नहीँ थे।सिमरन औऱ विजय ने घायल होने के बाबजूद अपने साथियों के साथ पाकिस्तानी फौज के छक्के छुड़ा दिए,औऱ सकुशल अपने बेस केम्प पर वापिस आकर अपने कमांडर को सेल्यूट मारते हैं।। विजय मिलेट्री अस्पताल में भर्ती हो जाता है।सिमरन उससे मिलने अस्पताल आती है।सिमरन विजय से पूछती है कि क्या वो उससे शादी करेगा?विनय तुरन्त हाँ कर देता है औऱ पूछता है कि तुम तो पहले से ही शादीशुदा हो फिर कैसे?सिमरन बताती है कि उसके घर वालो ने उसकी मर्जी के खिलाफ ये शादी की थी।अब में समझ गई हूँ कि मेरा सच्चा प्यार तो तुम ही हो।मैं जल्द ही अपने पति से तलाक ले लूंगी।औऱ ऐसा ही होता है।दोनों जल्द ही शादी कर लेते हैं औऱ अपने हनीमून पर निकल जाते हैं।यही कहानी का अंत है। कहानी के पात्र घटनाएं साथ नाम सभी काल्पनिक हैं इसका किसी घटना या स्थान से कोई सम्बन्ध नहीँ है।जिसके लिए लेखक जिम्मेदार नहीँ है। अरिनास शर्मा,बिलारी
Friday, February 14, 2025
निमंत्रण
धन्यवाद,निमंत्रण आप का स्वीकार है,परन्तु मेरा स्वभाव मुझे शांति की ओर धकेलता है,शोर भरी रातों से मैं हमेशा बचता रहा हूँ,धन्यवाद, तुम्हारे आदर-सम्मान के लिये,प्रभु खुशियाँ तुम्हें हज़ार दें,मैं नाराज़ नहीँ,मुझमें अहंकार भी नहीँ,परन्तु मैं महफ़िलों में क़भी नज़र आता ही नहीँ हूँ,मुझे मेरी ही हदों में रहने दो,मुझे मेरे सपनों को सजाने दो,मैं तुम्हारी दुनियाँ में दख़ल कहाँ देता हूँ,तुम भी दख़ल मेरी दुनियाँ में न दो,मैं जी नहीँ सकता तुम्हारी ज़िन्दगी को,तुम मुझे मेरी जिंदगी को जीने दो,है कोई ऐसा जो पथ से अपने भटक जाये,मुझको भी मेरे पथ पर ही चलने दो,मैं विरोधी नहीँ हूँ तुम्हारे विचारों का,मेरे विचारों को भी तुम तन्हा ही रहने दो,मैं क्या मेरी तन्हाई भी अब शोर से डरती है,तन्हा हूँ हाँ तो तन्हा मुझे तुम रहने दो,ज़िद न किया करो परम्पराऐं टूटती हैं ऐसे,बस तुम अपनी औऱ मुझे अपनी हद में रहने दो,क्यों गुज़रता नहीँ ये दिन देख़ो तो कितना लम्बा दिन हो गया है,अब सोना है मुझे रात को ज़रा तुम होने दो,मैं इश्क बहुत करता हूँ अपनी इस छवि से,हाथ पानी मे न डालो छवि मेरी यूँ ही रहने दो,मैं उजाला नहीँ हूँ सूरज का,रातों का साथी मुझे बने रहने दो,है बस एक औऱ आख़री इरतज़ा मेरी तुमसे,मुझे मेरी ही नज़रों में यूँ बार-बार गिरने न दो,मैं हूँ ज़िन्दा मेरे स्वभाव से ही,मेरे स्वभाव के साथ ही मुझे ज़िन्दा रहने दो। अरिनास शर्मा,बिलारी।
Friday, January 24, 2025
विधि का विधान।
एक-एक दाना चुन-चुन कर लाती है चिड़िया धीरे-धीरे बच्चे बड़े होते हैं औऱ एक दिन अचानक उड़ कर दूसरे पेड़ पर जा बैठते हैं औऱ चिड़िया बेचारी देखती रह जाती है।जिस घर में बच्चे जन्म लेते हैं बड़े होते हैं लायक बनते हैं औऱ अचानक एक दिन वही घर छोड़कर वो चले जाते हैं, माँ-बाप बेचारे देखते रह जाते हैं औऱ बच्चे पीछे मुड़कर भी नहीँ देखते हैं, शायद यही विधि का विधान है,यही प्रकृति का नियम है।ये दुनियाँ ये जीवन शायद इसी तरह चलता है।जीव;जंतु हों या समस्त मानव जाति हो सब पर एक ही नियम लागू है,मिलना है बिछड़ना है आना है जाना है यहाँ घर किसका है ये तो एक मुसाफिरखाना है,भृम तो क़िसी का रहा ही नहीँ मालिक तो कोई बना ही नहीँ, बस हम तो वो कलाकार हैं जो अपने-अपने क़िरदारों को निभाने आते हैं औऱ बस एक कट की आवाज़ आती है वापस अपने घर अपने परमपिता परमेश्वर के चरणों मे चले जाते हैं, यही तो विधि का विधान है,मग़र हम मूर्ख मानव मानने को तैयार ही नहीँ होते हैं कि यहाँ कोई अपना नहीँ है कोई रिश्ता नहीँ है कुछ भी तो हमारा नहीँ है,बस लड़े जा रहे हैं, मरे जा रहे हैं, हाय-हाय-काय-काय, क्या लाया क्या ले गया ,सब जानें हैं पर माने कोई न है।सच तो ये कि मौत तो सिर्फ़ बदनामी का ताज़ पहनकर आई है असल दर्द तो कम्बख़्त ये ज़िन्दगी दे रही है,एक पल हँसाती है तो अनेकों पल रुलाजती है,फ़िर भी इतनी मोहब्बत है इस खुदगर्ज ज़िन्दगी से कि बार-बार इसे जीने को मन करता है,लगता है जैसे हम-सब कोई अपराधी हैं जो जेल रूपी इस दुनियाँ में अपने-अपने ज़ुर्म की सज़ा काटने के लिए भेजे गए हैं, जिसकी सज़ा पूरी हो जाती है उसे वापस बुला लिया जाता है।ये कैसा सच है जीवन का,ये कैसा भृम है मानव का,ये कैसा दर्द है घर का जो क़भी ख़तम ही नहीँ होता है,जीवन होता है मग़र कुछ भी तो नहीँ होता है।शायद यही प्रकृति का नियम है ऐसे ही उसका संचालन होता है,ऐसे ही वो वक़्त-वक़्त पर वक़्त की मार से हमें सजा देता रहता है,औऱ हम नासमझ लोग रोते हैं गिड़गिड़ाते हैं फ़िर से कम्बख़्त यही ज़िन्दगी माँगते हैं औऱ फ़िर से एक नया भृम लेकर जीना शुरू कर देते हैं दर्द भरी ज़िन्दगी मग़र खूबसूरत सी ज़िन्दगी।न जाने इतना लगाव क्यों है इससे?शायद।यही तो विधि का विधान है। अरिनास शर्मा,बिलारी।
Friday, January 10, 2025
आज
आज हर आदमी के पास भरपूर गूगल ज्ञान औऱ यूट्यूब ज्ञान भरा पड़ा है,औऱ ये सच है कि मुझ जैसे आदमी ज्ञान के नाम पर शून्य लेकर जन्में हैं।तो कहने का मतलब है कि यदि आपके पास भरपूर मात्रा में ऊर्जा हो नाराज़ न होने की क़सम खा ली हो औऱ समय सीमा का भी अभाव न हो तभी ऐसे आदमियों के दर्शन करें औऱ सिर्फ़ धैर्यता का परिचय देते हुए हाथ जोड़ कर खड़े रहें, अन्यथा तुरन्त अपना मार्ग सुनिश्चित करें औऱ निकल लें।बस आज के लिए इतना ही काफ़ी है।महादेव सब पर अपनी कृपा बनाये रखें। अरिनास शर्मा,बिलारी।
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